यूजीसी नेट इतिहास PYQ-शैली अभ्यास प्रश्न
सभी 4 विषयों से 100 वास्तविक अभ्यास प्रश्न (प्रति विषय 25), असली यूजीसी नेट इतिहास PYQ की शैली व कठिनाई में, पूरे उत्तर व व्याख्या सहित — मुफ़्त।
प्राचीन भारत
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प्रश्न 1. कुषाण साम्राज्य के प्रशासनिक व सांस्कृतिक स्वरूप के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
I. कुषाण सिक्कों पर यूनानी, ईरानी व भारतीय देवताओं सहित एक असामान्य रूप से विविध देव-समूह प्रदर्शित होता था।
II. कुषाणों ने 'देवपुत्र' ('स्वर्ग/ईश्वर का पुत्र') की उपाधि अपनाई, जो राजकीय विचारधारा पर मध्य एशियाई प्रभावों को दर्शाती है।
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उत्तर: A) I और II दोनों सही हैं
दोनों कथन सही हैं। कुषाण सिक्के यूनानी, ईरानी (पारसी) व भारतीय देवताओं तक फैले एक असामान्य रूप से सारग्राही देव-समूह हेतु उल्लेखनीय हैं, जो साम्राज्य की विश्वजनीन सांस्कृतिक पहुँच को दर्शाते हैं, तथा कुषाण शासकों, विशेषतः कनिष्क ने, 'देवपुत्र' सहित भव्य उपाधियाँ अपनाईं, जो संभवतः मध्य/पूर्वी एशियाई (संभवतः चीनी-प्रभावित) दैवीय राजतंत्र की अवधारणाओं को प्रतिध्वनित करती हैं।
प्रश्न 2. भारत के उत्तर-पश्चिमी भागों में शक शासन स्थापित करने वाला इंडो-सिथियन (शक) शासक मौएस किस कारण महत्वपूर्ण है?
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उत्तर: A) क्षेत्र में स्वतंत्र राजनीतिक सत्ता स्थापित करने वाले सबसे प्राचीन शक शासकों में से एक होना, जो आगे दक्षिण में परवर्ती पश्चिमी क्षत्रप शासन से पूर्व का है
मौएस क्षेत्र में स्वतंत्र राजनीतिक सत्ता स्थापित करने वाले सबसे प्राचीन शक (इंडो-सिथियन) शासकों में से एक के रूप में महत्वपूर्ण है, जो शक राजनीतिक उपस्थिति के एक महत्वपूर्ण प्रारंभिक चरण का प्रतिनिधित्व करता है जो बाद में और दक्षिण व पश्चिम के क्षेत्रों में आगे शक/पश्चिमी क्षत्रप स्थापना देखेगा।
प्रश्न 3. कौन-सा अभिलेख भारत (महाभारत) युद्ध से आरंभ होने वाली कालगणना प्रणाली के सुझाव हेतु उल्लेखनीय है?
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उत्तर: A) पुलकेशिन द्वितीय का ऐहोल अभिलेख
कवि रविकीर्ति द्वारा रचित पुलकेशिन द्वितीय का ऐहोल अभिलेख इतिहासकारों के बीच एक ऐसी कालगणना प्रणाली के संदर्भ हेतु उल्लेखनीय है जो घटनाओं की तिथि भारत युद्ध से आरंभ करती प्रतीत होती है, जो प्राचीन भारतीय कालक्रम व पंचांग प्रणालियों संबंधी बहसों हेतु एक असामान्य आँकड़ा प्रस्तुत करती है।
प्रश्न 4. प्राचीन/प्रारंभिक मध्यकालीन कश्मीर के इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली निम्नलिखित रानियों को कालानुक्रम में व्यवस्थित कीजिए: (A) दिद्दा, (B) रद्दा, (C) सुगंधा, (D) सूर्यमती
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उत्तर: D) (C), (A), (D), (B)
इन कश्मीरी रानियों का सही कालानुक्रम है: सुगंधा (10वीं शताब्दी का आरंभ), दिद्दा (10वीं शताब्दी का उत्तरार्ध से 11वीं शताब्दी का आरंभ), सूर्यमती (11वीं शताब्दी, अनंत की पत्नी), तथा रद्दा (एक परवर्ती विभूति), जो कश्मीर के इतिहास में प्रत्येक की राजनीतिक प्रमुखता के क्रमिक कालों को दर्शाता है।
प्रश्न 5. मध्यकालीन दक्षिण भारतीय संस्था 'नगरम' (व्यापारी/व्यापार श्रेणी सभा) के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
I. नगरम सभाएँ स्थानीय स्तर पर व्यापारी व व्यापारिक समुदाय के हितों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठित निकायों के रूप में कार्य करती थीं।
II. नगरम सभाओं के विशेष रूप से कृषि कार्य थे, बिना किसी प्रकार के व्यापार अथवा वाणिज्य में भागीदारी के।
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उत्तर: B) केवल I सही है
कथन I सही है: नगरम सभाएँ प्रारंभिक मध्यकालीन दक्षिण भारत में स्थानीय स्तर पर व्यापारी व व्यापारिक समुदायों के हितों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठित निकायों के रूप में कार्य करती थीं, जो विशुद्ध कृषि ग्राम सभाओं (उर/सभा) से भिन्न थीं। कथन II गलत है तथा नगरम संस्था के परिभाषित वाणिज्यिक चरित्र का प्रत्यक्ष खंडन करता है।
प्रश्न 6. एलोरा के निम्नलिखित में से कौन-से गुफा मंदिर ब्राह्मणीय (हिंदू) धार्मिक परंपरा से संबद्ध हैं? (A) धूमर लेणा, (B) इंद्र सभा, (C) जगन्नाथ सभा, (D) रावण की खाई
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उत्तर: D) केवल (A) व (D)
धूमर लेणा तथा रावण की खाई एलोरा के ब्राह्मणीय (शैव) गुफा मंदिर हैं, जबकि इंद्र सभा तथा जगन्नाथ सभा उसी स्थल के जैन गुफा मंदिर हैं — अतः सही ब्राह्मणीय युग्म केवल (A) व (D) है।
प्रश्न 7. अभिकथन (A): आजीवक संप्रदाय, यद्यपि ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण है, ने अपने स्वयं के अपेक्षाकृत कम स्वतंत्र पाठ्य स्रोत छोड़े।
कारण (R): आजीवक सिद्धांत का हमारा अधिकांश ज्ञान बौद्ध व जैन ग्रंथों के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से आता है, जो प्रायः प्रतिद्वंद्वी संप्रदायों के प्रति आलोचनात्मक थे।
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उत्तर: C) A और R दोनों सत्य हैं, तथा R, A की सही व्याख्या है
दोनों कथन सही व परस्पर संबद्ध हैं: स्वतंत्र आजीवक पाठ्य स्रोतों की दुर्लभता सीधे इस तथ्य से व्याख्यायित होती है कि उनके सिद्धांत का हमारा उपलब्ध अधिकांश ज्ञान बौद्ध व जैन ग्रंथों के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से आता है, जो — प्रतिद्वंद्वी दार्शनिक परंपराओं की कृतियों के रूप में — प्रायः आजीवकों के विचारों को आलोचनात्मक अथवा विवादात्मक रूप से प्रस्तुत करते हैं, जो R को A की एक वैध व्याख्या बनाता है।
प्रश्न 8. वेंगी का पूर्वी चालुक्य राजवंश, जो बादामी के चालुक्यों से एक भिन्न शाखा है, की स्थापना किसने की?
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उत्तर: D) कुब्ज विष्णुवर्धन, पुलकेशिन द्वितीय के भाई
वेंगी के पूर्वी चालुक्य राजवंश की स्थापना बादामी के चालुक्य राजा पुलकेशिन द्वितीय के भाई कुब्ज विष्णुवर्धन ने की, जिन्हें वहाँ चालुक्य विजयों के पश्चात पूर्वी दक्कन क्षेत्रों का प्रभार सौंपा गया, जिसने आंध्र क्षेत्र में एक विशिष्ट, दीर्घजीवी शाखा राजवंश की स्थापना की।
प्रश्न 9. गंगावाड़ी (कर्नाटक) के पश्चिमी गंग राजवंश के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
I. वे जैन धर्म के संरक्षण हेतु उल्लेखनीय हैं, जिसका उदाहरण श्रवणबेलगोला की विशाल गोम्मटेश्वर प्रतिमा है।
II. उन्होंने अपने संपूर्ण इतिहास में एक पूर्णतः स्वतंत्र शक्ति के रूप में शासन किया, कभी किसी बड़ी क्षेत्रीय शक्ति के अधीन नहीं रहे।
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उत्तर: B) केवल I सही है
कथन I सही है: पश्चिमी गंग जैन धर्म के महत्वपूर्ण संरक्षक थे, श्रवणबेलगोला की विशाल गोम्मटेश्वर (बाहुबली) प्रतिमा उनके मंत्री चामुंडराय के अधीन बनवाई गई थी। कथन II गलत है: पश्चिमी गंग प्रायः पल्लव, चालुक्य तथा बाद में राष्ट्रकूटों जैसी बड़ी शक्तियों के अधीन अथवा उनसे संघर्षरत रहे, न कि निरंतर स्वतंत्र बने रहे।
प्रश्न 10. 'बेसनगर गरुड़ स्तंभ' अभिलेख यूनानी दूत हेलियोडोरस के किस विशिष्ट भक्ति परंपरा में धर्मांतरण को दर्ज करता है?
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उत्तर: C) भागवत धर्म (वासुदेव-कृष्ण की भक्ति)
बेसनगर (हेलियोडोरस) स्तंभ दर्ज करता है कि इंडो-यूनानी राजा एंटियालसीदास द्वारा शुंग राजा भागभद्र के दरबार में भेजे गए यूनानी राजदूत हेलियोडोरस ने वासुदेव की भक्ति में इस स्तंभ को गरुड़-ध्वज के रूप में स्थापित किया, तथा स्वयं को एक भागवत के रूप में पहचाना — यह भागवत धर्म के प्रसार हेतु एक महत्वपूर्ण प्रारंभिक स्रोत है।
प्रश्न 11. शक-सातवाहन काल के नासिक गुफा संख्या 10 के अभिलेखीय साक्ष्य के अनुसार, श्रेणियों को अनुदत्त स्थायी जमाओं (अक्षयनीवी) पर सामान्यतः लगभग किस दर से ब्याज मिलता था?
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उत्तर: C) 9 से 12%
नासिक गुफा संख्या 10 के अभिलेख शिल्प-श्रेणियों को दिए गए स्थायी अनुदानों (अक्षयनीवी) को दर्ज करते हैं, जिन पर दर्ज ब्याज दरें सामान्यतः 9 से 12% की सीमा में आती हैं, जो प्राचीन भारतीय श्रेणी-आधारित बैंकिंग व्यवहारों का मूल्यवान मात्रात्मक साक्ष्य प्रदान करती हैं।
प्रश्न 12. इक्ष्वाकु राजवंश के नागार्जुनकोंडा अभिलेख इतिहासकारों के बीच विशेष रूप से किसके साक्ष्य प्रदान करने हेतु उल्लेखनीय हैं?
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उत्तर: A) राजकीय महिलाओं द्वारा प्रमुख धार्मिक संरक्षण, जिसमें रानियों व राजकुमारियों द्वारा बौद्ध संस्थाओं को दान सम्मिलित है
नागार्जुनकोंडा अभिलेख इतिहासकारों द्वारा विशेष रूप से इक्ष्वाकु राजवंश की राजकीय महिलाओं द्वारा धार्मिक संरक्षण के प्रमुख साक्ष्य प्रदान करने हेतु मूल्यवान माने जाते हैं, जिनमें कई रानियों व राजकुमारियों को बौद्ध मठीय संस्थाओं के दाता के रूप में दर्ज किया गया है — यह प्राचीन भारत में लैंगिक इतिहास हेतु एक महत्वपूर्ण स्रोत है।
प्रश्न 13. अभिकथन (A): चोल कांस्य मूर्तियाँ, विशेषतः नटराज प्रतिमा, भारतीय धातु-ढलाई कला का एक उत्कर्ष बिंदु प्रस्तुत करती हैं।
कारण (R): इन्हें 'लुप्त-मोम' (सायर पेर्दु) ढलाई तकनीक का प्रयोग करते हुए निर्मित किया गया, जिसने सूक्ष्म विवरण व गतिशील मुद्राओं की अनुमति दी।
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उत्तर: B) A और R दोनों सत्य हैं, तथा R, A की सही व्याख्या है
दोनों कथन सही व प्रत्यक्ष रूप से संबद्ध हैं: इतिहासकार चोल कांस्यों, विशेषतः प्रसिद्ध नटराज प्रतिमा, को जो तकनीकी उत्कृष्टता प्रदान करते हैं, वह ठीक लुप्त-मोम ढलाई तकनीक के प्रयोग द्वारा व्याख्यायित होती है, जिसने इस कला-रूप की विशिष्ट सूक्ष्म विवरण व गतिशील, तरल मुद्राओं को सक्षम बनाया, जो R को A की एक वैध व्याख्या बनाता है।
प्रश्न 14. प्राचीन भारतीय संस्था 'गोत्र' (कुल/वंश वर्गीकरण) के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
I. गोत्र वर्गीकरण का प्रयोग परंपरागत रूप से विवाह को नियंत्रित करने हेतु किया जाता था, जो समान गोत्र के भीतर विवाह (सगोत्र विवाह) को निषिद्ध करता था।
II. गोत्र नाम विशेष रूप से भौगोलिक स्थान-नामों से व्युत्पन्न थे, जिनका पूर्वज ऋषि वंशों से कोई संबंध नहीं था।
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उत्तर: B) केवल I सही है
कथन I सही है: गोत्र वर्गीकरण परंपरागत रूप से विवाह प्रथाओं को नियंत्रित करता था, जिसमें सगोत्र विवाह सामान्यतः निषिद्ध था क्योंकि यह साझा पूर्वज वंश को इंगित करता था। कथन II गलत है: गोत्र नाम परंपरागत रूप से मुख्यतः पूर्वज ऋषि वंशों (जैसे भारद्वाज, कश्यप, वशिष्ठ) से व्युत्पन्न थे, न कि भौगोलिक स्थान-नामों से।
प्रश्न 15. चोल अभिलेखों में प्रमाणित 'कुडवोलै' व्यवस्था किसे संदर्भित करती थी?
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उत्तर: D) ग्राम सभा समितियों के सदस्यों के चयन हेतु एक लॉटरी/चिट्ठी-आधारित पद्धति
उत्तरमेरूर अभिलेखों में दर्ज कुडवोलै व्यवस्था, चोल ग्राम सभा समितियों में सेवा हेतु योग्य उम्मीदवारों के चयन की एक लॉटरी/चिट्ठी-आधारित पद्धति थी — योग्य उम्मीदवारों के नाम ताड़-पत्र की चिट्ठियों (ओलै) पर लिखे जाते थे जिन्हें एक घड़े (कुड) में रखा जाता था जिससे एक बालक विजयी नाम निकालता था।
प्रश्न 16. अभिकथन (A): ऋग्वेद को इतिहासकारों द्वारा सामान्यतः चार वेदों में सबसे प्राचीन माना जाता है।
कारण (R): इसकी भाषा व विषयवस्तु वैदिक संस्कृत के एक प्रारंभिक चरण तथा एक पशुचारक, अर्ध-खानाबदोश जनजातीय समाज के निकट एक सामाजिक-धार्मिक जगत को दर्शाती है।
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उत्तर: C) A और R दोनों सत्य हैं, तथा R, A की सही व्याख्या है
दोनों कथन सही व परस्पर संबद्ध हैं: ऋग्वेद के अपेक्षाकृत प्राचीन भाषाई रूप तथा एक मुख्यतः पशुचारक, अर्ध-खानाबदोश जनजातीय समाज (परवर्ती संहिताओं के अधिक स्थायी कृषि, अनुष्ठानिक रूप से विस्तृत जगत के बजाय) का इसका चित्रण ठीक वही कारण है जिसके चलते इतिहासकार व भाषाविद् इसे चारों वेदों में सबसे प्राचीन मानते हैं, जो R को A की एक वैध व्याख्या बनाता है।
प्रश्न 17. गौतमी बलश्री की 'नासिक प्रशस्ति', जो उनके पुत्र गौतमीपुत्र सातकर्णि की प्रशंसा करती है, इतिहासकारों के बीच शैलीगत दृष्टि से किस कारण उल्लेखनीय है?
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उत्तर: C) परवर्ती, अधिक प्रसिद्ध इलाहाबाद स्तंभ प्रशस्ति से पूर्व की अलंकृत संस्कृत गद्य प्रशस्ति का इसका प्रारंभिक व विस्तृत प्रयोग
अभिलेखशास्त्र के इतिहासकार नोट करते हैं कि गौतमी बलश्री की नासिक प्रशस्ति संस्कृत प्रशस्ति (गुणगान) रचना का एक प्रारंभिक व शैलीगत रूप से विस्तृत उदाहरण प्रस्तुत करती है, तथा इसे कभी-कभी हरिषेण की परवर्ती, अधिक प्रसिद्ध इलाहाबाद स्तंभ प्रशस्ति के शैलीगत पूर्ववर्ती के रूप में चर्चित किया जाता है।
प्रश्न 18. उड़ीसी (कलिंग-शैली) मंदिर स्थापत्य के निम्नलिखित भागों का नीचे से ऊपर तक क्रम व्यवस्थित कीजिए: (A) बरंडा, (B) बेकी, (C) खपुरी, (D) पभाग
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उत्तर: B) (D), (A), (B), (C)
उड़ीसी (कलिंग) मंदिर स्थापत्य में शिखर घटकों का नीचे से ऊपर तक ऊर्ध्वाधर क्रम है: पभाग (आधार साँचे), बरंडा (मुख्य दीवार खंड के ऊपर एक क्षैतिज पट्टी), बेकी (शीर्ष तत्वों के नीचे का ग्रीवा/अवनत खंड), तथा खपुरी (शीर्षस्थ आमलक-सदृश शिखर खंड) — जो विकल्प (D) से मेल खाता है।
प्रश्न 19. निम्नलिखित प्रारंभिक मध्यकालीन राज्यों का उनके अभिलेखों में प्रमाणित एक विशिष्ट प्रशासनिक/सांस्कृतिक विशेषता से मिलान कीजिए:
I. चोल 1. विस्तृत ग्राम स्वशासन अभिलेख (उत्तरमेरूर)
II. प्रतिहार 2. सर्वोच्च सत्ता के प्रतीक के रूप में कन्नौज पर नियंत्रण
III. राष्ट्रकूट 3. कन्नड़ साहित्य को संरक्षण (कविराजमार्ग)
IV. पाल 4. वज्रयान बौद्ध धर्म को संरक्षण (विक्रमशिला)
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उत्तर: C) I-1, II-2, III-3, IV-4
सही मिलान है: चोल — उत्तरमेरूर अभिलेखों से उदाहृत विस्तृत ग्राम स्वशासन अभिलेख; प्रतिहार — सर्वोच्च सत्ता के प्रतीक के रूप में कन्नौज पर नियंत्रण; राष्ट्रकूट — कविराजमार्ग से उदाहृत कन्नड़ साहित्य को संरक्षण; तथा पाल — विक्रमशिला से उदाहृत वज्रयान बौद्ध धर्म को संरक्षण।
प्रश्न 20. निम्नलिखित को उनकी रचना/संकलन के कालानुक्रम में व्यवस्थित कीजिए: (A) इलाहाबाद स्तंभ अभिलेख, (B) रुद्रदामन का जूनागढ़ शिलालेख, (C) ऐहोल अभिलेख, (D) हाथीगुम्फा अभिलेख
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उत्तर: D) (D), (B), (A), (C)
सही कालानुक्रम है: खारवेल का हाथीगुम्फा अभिलेख (लगभग पहली शताब्दी ई.पू./दूसरी-पहली शताब्दी ई.पू.), रुद्रदामन प्रथम का जूनागढ़ शिलालेख (लगभग 150 ई.), समुद्रगुप्त का इलाहाबाद स्तंभ अभिलेख (लगभग 350 का दशक ई.), तथा पुलकेशिन द्वितीय का ऐहोल अभिलेख (लगभग 634 ई.)।
प्रश्न 21. पश्चिमी चालुक्य राजा विक्रमादित्य VI के राज्यकाल हेतु एक महत्वपूर्ण साहित्यिक-ऐतिहासिक स्रोत, संस्कृत काव्य 'विक्रमांकदेवचरित', किसके द्वारा रचित है?
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उत्तर: B) बिल्हण
विक्रमांकदेवचरित, जो पश्चिमी चालुक्य राजा विक्रमादित्य VI के राज्यकाल व उपलब्धियों का गुणगान करने वाला एक दरबारी महाकाव्य है, कवि बिल्हण द्वारा रचित है, तथा यह कल्याणी के परवर्ती चालुक्यों के राजनीतिक इतिहास हेतु एक महत्वपूर्ण, यद्यपि प्रशस्तिपरक, साहित्यिक स्रोत के रूप में कार्य करता है।
प्रश्न 22. इंडो-पार्थियन शासक गोंडोफर्नीस के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
I. उनका उल्लेख तख्त-ए-बाही अभिलेख में मिलता है, जो उनके राज्यकाल हेतु कालानुक्रमिक आँकड़े प्रदान करता है।
II. ईसाई अपोक्रिफल परंपरा उन्हें प्रेरित थॉमस की उनके दरबार में एक पौराणिक यात्रा से जोड़ती है।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: D) I और II दोनों सही हैं
दोनों कथन सही हैं। तख्त-ए-बाही अभिलेख गोंडोफर्नीस के राज्यकाल हेतु महत्वपूर्ण कालानुक्रमिक साक्ष्य प्रदान करता है, तथा ईसाई अपोक्रिफल परंपरा (एक्ट्स ऑफ थॉमस) उन्हें प्रेरित थॉमस की एक पौराणिक यात्रा से जोड़ती है, जो इंडो-पार्थियन इतिहास तथा प्रारंभिक ईसाई कथा के बीच एक रोचक संबंध-बिंदु है।
प्रश्न 23. वर्तमान बलूचिस्तान (पाकिस्तान) में स्थित नवपाषाणिक स्थल मेहरगढ़ किसके साक्ष्य प्रदान करने हेतु महत्वपूर्ण है?
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उत्तर: A) दक्षिण एशिया में कृषि व स्थायी ग्राम जीवन के सबसे प्राचीन ज्ञात उदाहरणों में से एक, जो हड़प्पा सभ्यता से सहस्राब्दियों पूर्व का है
पुरातत्वविदों द्वारा मेहरगढ़ को व्यापक रूप से दक्षिण एशिया में कृषि, पशु-पालतूकरण तथा स्थायी ग्राम जीवन के सबसे प्राचीन उदाहरणों में से एक का साक्ष्य प्रदान करने वाला माना जाता है, जिसकी निवास परतें लगभग 7000 ई.पू. तक जाती हैं — जो परिपक्व हड़प्पा सभ्यता से काफी पूर्व की है तथा दक्षिण एशियाई कृषि-संक्रमण की स्वदेशी जड़ों हेतु महत्वपूर्ण साक्ष्य प्रदान करती है।
प्रश्न 24. चंद बरदाई से संबद्ध ब्रजभाषा का एक भाट महाकाव्य, 'पृथ्वीराज रासो', मुख्यतः किस शासक के कारनामों का गुणगान करने वाला एक इतिहास-लेखन दृष्टि से महत्वपूर्ण स्रोत है?
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उत्तर: D) चौहान (चाहमान) राजवंश के पृथ्वीराज चौहान तृतीय
चंद बरदाई से परंपरागत रूप से संबद्ध पृथ्वीराज रासो, दिल्ली के अंतिम हिंदू शासक, पृथ्वीराज चौहान तृतीय, के कारनामों का गुणगान करता है, जो मुहम्मद गोरी की विजय से पूर्व के थे — यद्यपि इतिहासकार पाठ की भारी रूप से पौराणिक व अलंकृत प्रकृति को नोट करते हैं, जो इसके साहित्यिक-वीरतापूर्ण मूल्य को सख्त ऐतिहासिक विश्वसनीयता से भिन्न बनाता है।
प्रश्न 25. पाल शासक देवपाल के राज्यकाल का क्षेत्रीय विस्तार विशेष रूप से किस अभिलेख में दर्ज है, जो उपमहाद्वीप के व्यापक भाग में उनकी विजयों का वर्णन करता है?
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उत्तर: B) मुंगेर (मोंघीर) ताम्रपत्र अभिलेख
देवपाल का मुंगेर (मोंघीर) ताम्रपत्र अभिलेख एक प्रमुख अभिलेखीय स्रोत है जो उनके राज्यकाल से संबद्ध विस्तृत क्षेत्रीय दावों व विजयों को दर्ज करता है, जो 9वीं शताब्दी ई. में पाल राजवंश के राजनीतिक व क्षेत्रीय विस्तार के शिखर को दर्शाता है।
मध्यकालीन भारत
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प्रश्न 26. मध्यकालीन भारतीय जहाज-निर्माण व समुद्री व्यापार परंपरा के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
I. गुजरात के बंदरगाह पश्चिम एशिया व पूर्वी अफ्रीका के साथ हिंद महासागरीय व्यापार में प्रयुक्त बड़े समुद्री जलयानों के निर्माण हेतु उल्लेखनीय थे।
II. भारतीय जहाज-निर्माताओं का संपूर्ण मध्यकाल में अरब अथवा तुर्क नौसैनिक प्रौद्योगिकी के साथ कोई अंतःक्रिया अथवा प्रभाव नहीं था।
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उत्तर: D) केवल I सही है
कथन I सही है: गुजराती बंदरगाह, विशेषतः सूरत व खंभात, व्यापक हिंद महासागरीय व्यापार में संलग्न बड़े समुद्री जलयानों के निर्माण हेतु प्रसिद्ध केंद्र थे। कथन II गलत व अतिरंजित है — संपूर्ण मध्यकाल में भारतीय, अरब तथा अन्य हिंद महासागरीय परंपराओं के बीच महत्वपूर्ण तकनीकी व वाणिज्यिक अंतःक्रिया थी, अलगाव नहीं।
प्रश्न 27. निम्नलिखित मध्यकालीन भक्ति काव्य शब्दों का उस क्षेत्रीय परंपरा से मिलान कीजिए जिससे वे संबंधित हैं:
I. अभंग 1. कन्नड़
II. वचन 2. मराठी
III. पद 3. हिंदी/ब्रज
IV. कीर्तन 4. बंगाली (व्यापक भक्ति गायन भी)
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: C) I-2, II-1, III-3, IV-4
सही मिलान है: अभंग — मराठी भक्ति (वारकरी) परंपरा; वचन — कन्नड़ लिंगायत/वीरशैव परंपरा; पद — हिंदी/ब्रज भक्ति गीत रूप (सूरदास व अन्य कृष्ण-भक्ति कवियों से संबद्ध); तथा कीर्तन — विशेषतः चैतन्य के अधीन बंगाल में प्रमुख एक व्यापक भक्ति गायन परंपरा।
प्रश्न 28. निम्नलिखित मध्यकालीन भारतीय आर्थिक/प्रशासनिक विकासों को कालानुक्रम में व्यवस्थित कीजिए: (A) VOC बंगाल व्यापार का ओम प्रकाश का आधुनिक इतिहास-लेखन अध्ययन, (B) डच ईस्ट इंडिया कंपनी (VOC) की स्थापना, (C) शेर शाह सूरी का रुपिया प्रवर्तन, (D) मुगलों के अधीन बंजारा-सुगम अनाज व्यापार का शिखर
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: D) (C), (B), (D), (A)
सही कालानुक्रम है: शेर शाह सूरी का रुपिया प्रवर्तन (1540 का दशक), डच ईस्ट इंडिया कंपनी/VOC की स्थापना (1602), मुगल साम्राज्य के अधीन बंजारा-सुगम अनाज व्यापार का शिखर (17वीं शताब्दी), तथा VOC बंगाल व्यापार का ओम प्रकाश का आधुनिक इतिहास-लेखन अध्ययन (20वीं-21वीं शताब्दी) — जो मूल ऐतिहासिक विकासों से लेकर उनके परवर्ती अकादमिक विश्लेषण तक फैला है।
प्रश्न 29. मुगलकालीन साहित्यिक विधा 'मल्फूज़ात-ए-तिमुरी', जो कथित रूप से तिमुर के अपने संस्मरण हैं, को इतिहासकार सामान्यतः किस स्तर की स्रोत-आलोचनात्मक सावधानी से देखते हैं?
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उत्तर: D) पर्याप्त सावधानी, क्योंकि तिमुर की वास्तविक आत्मकथात्मक कृति के रूप में इसकी प्रामाणिकता पर कई विद्वानों ने प्रश्न उठाए हैं
इतिहासकार सामान्यतः मल्फूज़ात-ए-तिमुरी (अथवा तुज़ुक-ए-तिमुरी) को पर्याप्त स्रोत-आलोचनात्मक सावधानी से देखते हैं, क्योंकि तिमुर की स्वयं की वास्तविक आत्मकथात्मक रचना के रूप में इसकी प्रामाणिकता पर कई विद्वानों ने प्रश्न उठाए हैं, जो सुझाव देते हैं कि यह एक सख्ती से समकालीन व्यक्तिगत संस्मरण के बजाय एक परवर्ती संकलन अथवा अलंकरण हो सकता है।
प्रश्न 30. मुगल स्थापत्य में प्रमुखता से प्रयुक्त मध्यकालीन भारतीय 'चारबाग' उद्यान डिज़ाइन के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
I. इसमें फारसी उद्यान परंपराओं पर आधारित, पगडंडियों अथवा बहते जल द्वारा चार भागों में विभाजित एक चतुर्भुजीय अभिन्यास सम्मिलित था।
II. इसका प्रयोग विशेष रूप से सजावटी प्रयोजनों हेतु होता था, बिना इसके डिज़ाइन से जुड़े किसी प्रतीकात्मक अथवा धार्मिक महत्व के।
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उत्तर: C) केवल I सही है
कथन I सही है: चारबाग डिज़ाइन में फारसी उद्यान डिज़ाइन परंपराओं पर आधारित, पगडंडियों अथवा बहते जल की नहरों द्वारा चार भागों में विभाजित एक चतुर्भुजीय अभिन्यास सम्मिलित था, जो ताजमहल जैसे मुगल स्थापत्य परिसरों में प्रमुखता से प्रयुक्त हुआ। कथन II गलत है: चारबाग डिज़ाइन प्रतीकात्मक महत्व रखता था, जिसे प्रायः इस्लामी परंपरा में वर्णित स्वर्ग (जन्नत) के निरूपण के रूप में समझा जाता था, न कि यह विशुद्ध सजावटी प्रयोजनों की सेवा करता था।
प्रश्न 31. मध्यकालीन भारतीय काव्य विधा 'ग़ज़ल', जो मुगल संरक्षण में महत्वपूर्ण रूप से फली-फूली, मुख्यतः किस विशेषता से चिह्नित है?
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उत्तर: D) तुकांत युग्मकों का एक संरचित रूप जो सामान्यतः प्रेम, विरह तथा रहस्यवादी तड़प के विषयों की पड़ताल करता है
ग़ज़ल तुकांत युग्मकों से बना एक संरचित काव्य रूप है, जो सामान्यतः रोमांटिक प्रेम, विरह तथा प्रायः रहस्यवादी/आध्यात्मिक तड़प के विषयों की पड़ताल करता है, तथा यह मुगल दरबारी संरक्षण के अंतर्गत एक साहित्यिक विधा के रूप में महत्वपूर्ण रूप से फला-फूला, फारसी तथा बाद में उर्दू में लिखने वाले कवियों ने इसके समृद्ध विकास में योगदान दिया।
प्रश्न 32. मध्यकालीन भारतीय मुद्रा व्यवस्था के सल्तनत-कालीन 'टंका' से मुगल-कालीन 'रुपिया' तक संक्रमण के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
I. सूर अंतराल-शासन के दौरान प्रवर्तित शेर शाह सूरी की मानकीकृत रजत रुपिया को अकबर के परवर्ती मुगल प्रशासन ने पर्याप्त रूप से बनाए रखा तथा परिष्कृत किया।
II. सल्तनत-कालीन व मुगल-कालीन मुद्रा व्यवस्थाओं के बीच किसी भी प्रकार की कोई निरंतरता नहीं थी, तथा मुगलों ने शुरू से एक पूर्णतः नई मुद्रा का आविष्कार किया।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: D) केवल I सही है
कथन I सही है: उनके अंतराल-शासन के दौरान प्रवर्तित शेर शाह सूरी की मानकीकृत रजत रुपिया को अकबर के परवर्ती मुगल प्रशासन ने पर्याप्त रूप से बनाए रखा तथा आगे परिष्कृत किया, जिसने स्थायी मुगल-कालीन रुपिया मुद्रा व्यवस्था का आधार बनाया। कथन II गलत है तथा सूर-कालीन व मुगल-कालीन मौद्रिक व्यवस्थाओं के बीच इस सुदस्तावेजीकृत निरंतरता का प्रत्यक्ष खंडन करता है।
प्रश्न 33. मध्यकालीन भारत में यूनानी (उनानी) चिकित्सा ज्ञान के संचरण के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
I. यूनानी चिकित्सा, जो पर्याप्त रूप से अरबी व फारसी स्रोतों के माध्यम से संचरित यूनानी (गैलेनिक) चिकित्सा सिद्धांत पर आधारित थी, स्वदेशी आयुर्वेदिक परंपरा के साथ-साथ विकसित हुई।
II. यूनानी व आयुर्वेदिक चिकित्सा परंपराएँ संपूर्ण मध्यकाल में एक-दूसरे से पूर्णतः पृथक रहीं, बिना किसी अंतर-प्रभाव अथवा साझा संस्थागत स्थानों के।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: C) केवल I सही है
कथन I सही है: यूनानी चिकित्सा, जो अरबी व फारसी विद्वता के माध्यम से संचरित यूनानी चिकित्सा सिद्धांत में निहित थी, स्वदेशी आयुर्वेद के साथ-साथ मध्यकालीन भारत में एक महत्वपूर्ण चिकित्सा परंपरा के रूप में विकसित हुई। कथन II गलत है: इतिहासकार यूनानी व आयुर्वेदिक व्यवसायियों के बीच अंतर-प्रभाव, साझा संरक्षण, तथा कभी-कभी संस्थागत अतिव्यापन के उदाहरण दस्तावेजीकृत करते हैं, न कि पूर्ण व संपूर्ण पृथकता।
प्रश्न 34. मध्यकालीन भारतीय विधा 'तज़किरा' (जीवनी शब्दकोश) के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
I. तज़किरे सामान्यतः सूफी संतों, कवियों अथवा विद्वानों के जीवनी विवरणों का संकलन करते थे, जो प्रायः कालानुक्रमिक रूप से अथवा आध्यात्मिक वंशावली के अनुसार व्यवस्थित होते थे।
II. मध्यकालीन भारतीय सल्तनत अथवा मुगल काल से कोई तज़किरा कभी उपलब्ध नहीं हुआ, यह विधा भारतीय इस्लामी साहित्यिक परंपरा से पूर्णतः अनुपस्थित है।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: D) केवल I सही है
कथन I सही है: तज़किरे सामान्यतः सूफी संतों, कवियों अथवा विद्वानों के जीवनी विवरणों का संकलन करते थे, जो प्रायः कालानुक्रमिक रूप से अथवा आध्यात्मिक वंशावली के अनुसार संगठित होते थे, तथा इंडो-फारसी साहित्यिक परंपरा के भीतर एक महत्वपूर्ण विधा के रूप में कार्य करते थे। कथन II गलत है तथा मध्यकालीन भारतीय सल्तनत व मुगल कालों से उपलब्ध पर्याप्त तज़किरा साहित्य कोश द्वारा प्रत्यक्ष रूप से खंडित होता है।
प्रश्न 35. असम का 'आहोम' राज्य मध्यकालीन भारतीय राजनीतिक इतिहास में विशेष रूप से किस कारण उल्लेखनीय है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: A) बार-बार मुगल सैन्य अभियानों का सफलतापूर्वक प्रतिरोध करना तथा असामान्य रूप से दीर्घ अवधि तक स्वतंत्रता बनाए रखना
असम का आहोम राज्य विशेष रूप से बार-बार मुगल सैन्य अभियानों (प्रसिद्ध 1671 के सरायघाट युद्ध सहित) का सफलतापूर्वक प्रतिरोध करने तथा कई अन्य क्षेत्रीय राज्यों की तुलना में असामान्य रूप से दीर्घ अवधि तक अपनी स्वतंत्रता बनाए रखने हेतु उल्लेखनीय है, जो अंततः मुगल विस्तार के आगे झुक गए।
प्रश्न 36. 'तस्लीम' (अभिवादन का एक रूप) से जुड़ी मध्यकालीन भारतीय दरबारी शिष्टाचार प्रथा के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
I. तस्लीम में सामान्यतः दाहिने हाथ की पीठ को ज़मीन पर रखना तथा फिर उसे सिर/माथे तक उठाना सम्मिलित था।
II. यह अभिवादन का रूप पहली बार अलाउद्दीन खिलजी द्वारा प्रवर्तित किया गया, जिसकी पूर्ववर्ती सल्तनत दरबारी प्रथा में कोई मिसाल नहीं थी।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: D) केवल I सही है
कथन I सही है: तस्लीम, अभिवादन का एक रूप, में सामान्यतः दाहिने हाथ की पीठ को ज़मीन पर रखना तथा फिर उसे सिर अथवा माथे की ओर उठाना सम्मिलित था, जो शासक के प्रति श्रद्धा व्यक्त करता था। कथन II गलत है: इस अथवा तुलनीय दरबारी अभिवादन रूपों की पूर्ववर्ती सल्तनत प्रथा तथा व्यापक फारसीभाषी दरबारी परंपराओं में मिसाल थी, न कि यह अलाउद्दीन खिलजी के राज्यकाल हेतु विशिष्ट एक पूर्णतः नवीन प्रवर्तन था।
प्रश्न 37. अकबर के दरबार में एक प्रमुख विभूति, मध्यकालीन भारतीय विद्वान फतहुल्लाह शिराज़ी, विशेष रूप से किन क्षेत्रों में अपने योगदान हेतु उल्लेखनीय हैं?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: D) खगोलशास्त्र, यांत्रिक उपकरणों तथा प्रशासनिक/राजस्व गणना प्रणालियों सहित कई क्षेत्र
अकबर के दरबार में एक बहुज्ञ विद्वान, फतहुल्लाह शिराज़ी ने खगोलशास्त्र, यांत्रिक उपकरणों के डिज़ाइन (एक बहु-नली बंदूक तंत्र की रिपोर्ट सहित), तथा राजस्व गणना में प्रशासनिक नवाचारों सहित कई क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान दिया, जो अकबर के अधीन मुगल दरबार में विकसित व्यापक बौद्धिक संस्कृति को दर्शाता है।
प्रश्न 38. निम्नलिखित मध्यकालीन उत्तर भारतीय राजवंशों/राज्यों को उनकी स्थापना के कालानुक्रम में व्यवस्थित कीजिए: (A) लोदी राजवंश, (B) सूर राजवंश, (C) सैयद राजवंश, (D) चित्तौड़गढ़ में सिसोदिया शासन (एक महत्वपूर्ण राजपूत शक्ति के रूप में)
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: C) (D), (C), (A), (B)
सही कालानुक्रम है: चित्तौड़गढ़ में एक महत्वपूर्ण राजपूत शक्ति के रूप में सिसोदिया स्थापना (अपने प्रारंभिक चरण में सल्तनत-कालीन राजवंशों से पूर्व की), सैयद राजवंश (1414), लोदी राजवंश (1451), तथा सूर राजवंश (1540) — यद्यपि सिसोदिया राजवंश की उत्पत्ति सल्तनत काल से पूर्व की है, इस विशिष्ट तुलनात्मक संदर्भ में इसकी महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रमुखता को इस अनुक्रमण प्रश्न के प्रयोजनों हेतु इस सापेक्ष क्रम में माना गया है।
प्रश्न 39. मध्यकालीन भारतीय संस्था 'खुद-काश्त' व 'पाही-काश्त' कृषकों के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
I. खुद-काश्त कृषक अपने ही गाँव के भीतर भूमि जोतने वाले निवासी कृषक थे।
II. पाही-काश्त कृषक अपने गाँव के अलावा किसी अन्य गाँव में भूमि जोतने वाले गैर-निवासी कृषक थे, जो प्रायः श्रम आकर्षित करने हेतु अधिक अनुकूल शर्तों पर होते थे।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: B) I और II दोनों सही हैं
दोनों कथन सही हैं। खुद-काश्त कृषक अपने गृह-गाँव के भीतर खेती करने वाले निवासी कृषक थे, जबकि पाही-काश्त कृषक अपने गाँव के अलावा किसी अन्य गाँव में खेती करने वाले गैर-निवासी कृषक थे, जो कभी-कभी अल्प-कृषित भूमि की ओर अतिरिक्त श्रम आकर्षित करने हेतु प्रदत्त अधिक अनुकूल राजस्व शर्तों से आकर्षित होते थे।
प्रश्न 40. राणा प्रताप के अधीन मेवाड़ के मुगल सत्ता के प्रतिरोध को, विशेषतः हल्दीघाटी युद्ध (1576) के पश्चात, इतिहासकार सामान्यतः किस रूप में चिह्नित करते हैं?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: D) एक निरंतर, यद्यपि अंततः पूर्णतः निर्णायक नहीं, छापामार-शैली का प्रतिरोध जिसने युद्ध के अनिर्णायक सैन्य परिणाम के बावजूद मेवाड़ के पूर्ण मुगल अधीनीकरण से बचाव किया
इतिहासकार सामान्यतः हल्दीघाटी के पश्चात राणा प्रताप के प्रतिरोध को एक निरंतर, छापामार-शैली के अभियान के रूप में चिह्नित करते हैं जिसने, युद्ध के अपने अनिर्णायक सैन्य परिणाम के बावजूद, बाद के वर्षों तक मुगल सत्ता द्वारा मेवाड़ के पूर्ण अधीनीकरण से बचाव करने में सफलता पाई — यह एक ऐसा प्रतिरोध है जो राजपूत ऐतिहासिक स्मृति में महत्वपूर्ण प्रतीकात्मक व इतिहास-लेखन महत्व रखता है।
प्रश्न 41. मध्यकालीन भारतीय संस्था 'कारकुन' (लिपिक/लेखाकार) के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
I. कारकुन विभिन्न प्रशासनिक स्तरों पर आवश्यक अभिलेखन व लेखांकन कार्य संपन्न करते थे।
II. मराठी-भाषी कारकुनों ने दक्कन/मराठा प्रशासनिक अभिलेखन में विशेष रूप से उल्लेखनीय भूमिका निभाई, मोडी लिपि में उनकी साक्षरता को देखते हुए।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: D) I और II दोनों सही हैं
दोनों कथन सही हैं। कारकुनों ने मध्यकालीन भारतीय राज्य-व्यवस्थाओं भर में विभिन्न प्रशासनिक स्तरों पर आवश्यक लिपिकीय व लेखांकन कार्य संपन्न किए, तथा विशेष रूप से दक्कन/मराठा संदर्भ में, मोडी लिपि में साक्षर कारकुनों ने प्रशासनिक अभिलेखन में एक विशेष रूप से उल्लेखनीय व सुदस्तावेजीकृत भूमिका निभाई।
प्रश्न 42. गजनवी काल हेतु एक महत्वपूर्ण प्रारंभिक स्रोत, इतिवृत्त 'तारीख-ए-यामिनी' (जिसे किताब-ए-यामिनी भी कहा जाता है), किसके द्वारा रचित है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: B) अल-उत्बी
अल-उत्बी की 'तारीख-ए-यामिनी' महमूद गजनवी के राज्यकाल तथा प्रारंभिक गजनवी काल हेतु एक प्रमुख अरबी-भाषा स्रोत है, जो दिल्ली सल्तनत की वास्तविक स्थापना से पूर्व की है किंतु उत्तर भारत में तुर्क आक्रमणों की पृष्ठभूमि को समझने हेतु आवश्यक है।
प्रश्न 43. 'जागीरदारी संकट' (परवर्ती मुगल पतन में एक प्रस्तावित कारक) के इतिहास-लेखन के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
I. सतीश चंद्र सहित कुछ इतिहासकारों ने तर्क दिया है कि बढ़ते मनसबदारों की संख्या के सापेक्ष उपलब्ध जागीर भूमि की कमी ने 17वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में महत्वपूर्ण प्रशासनिक तनाव उत्पन्न किया।
II. इस सिद्धांत को बिना किसी परवर्ती विद्वत्तापूर्ण आलोचना अथवा योग्यता के सार्वभौमिक रूप से स्वीकार किया गया है।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: B) केवल I सही है
कथन I सही है: सतीश चंद्र के प्रभावशाली सिद्धांत ने तर्क दिया कि उपलब्ध जागीर भूमि की आपूर्ति तथा नियुक्ति की आवश्यकता वाले मनसबदारों की बढ़ती संख्या के बीच बढ़ती असंगति ने 17वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में महत्वपूर्ण प्रशासनिक व राजकोषीय तनाव उत्पन्न किया, जिसने व्यापक मुगल कठिनाइयों में योगदान दिया। कथन II गलत है: अधिकांश प्रमुख इतिहास-लेखन सिद्धांतों की भाँति, जागीरदारी संकट सिद्धांत परवर्ती विद्वत्तापूर्ण चर्चा, परिष्करण तथा कुछ आलोचना के अधीन रहा है, न कि इसे बिना किसी योग्यता के सार्वभौमिक रूप से स्वीकार किया गया।
प्रश्न 44. मध्यकालीन भारतीय सचित्र पांडुलिपि परंपराओं (जैसे अकबर के अधीन निर्मित हमज़ानामा) के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
I. हमज़ानामा एक असामान्य रूप से बड़े पैमाने की सचित्र पांडुलिपि परियोजना थी, जिसमें कई कलाकार एक विस्तारित अवधि तक सहयोगात्मक रूप से कार्यरत थे।
II. इसे पूर्णतः यंत्रीकृत मुद्रण प्रक्रिया का प्रयोग करते हुए निर्मित किया गया, बिना किसी हस्त-चित्रित चित्रण के।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: C) केवल I सही है
कथन I सही है: हमज़ानामा अकबर के अधीन नियोजित एक असामान्य रूप से महत्वाकांक्षी, बड़े पैमाने की सचित्र पांडुलिपि परियोजना थी, जिसमें कलाकारों की एक पर्याप्त टीम अपने कई बड़े-प्रारूप सचित्र पृष्ठों के निर्माण हेतु एक विस्तारित अवधि (कथित रूप से लगभग 15 वर्ष) तक सहयोगात्मक रूप से कार्यरत थी। कथन II गलत है: हमज़ानामा के चित्रण पूर्णतः हस्त-चित्रित थे, न कि किसी यंत्रीकृत मुद्रण प्रक्रिया से निर्मित, जो इस संदर्भ में ऐसे विस्तृत रंग चित्रण हेतु विद्यमान ही नहीं थी।
प्रश्न 45. मध्यकालीन भारतीय वस्त्र व्यापार के इतिहास-लेखन के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
I. ओम प्रकाश जैसे इतिहासकारों ने 17वीं-18वीं शताब्दी में बंगाल की वस्त्र निर्यात अर्थव्यवस्था के परिमाण व संगठन का विस्तार से दस्तावेजीकरण किया है।
II. इस बात पर पूर्ण विद्वत्तापूर्ण सहमति है कि 1757 से पूर्व यूरोपीय व्यापारिक कंपनियों का भारतीय वस्त्र उत्पादन के संगठन पर कोई सार्थक प्रभाव नहीं था।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: C) केवल I सही है
कथन I सही है: ओम प्रकाश तथा अन्य आर्थिक इतिहासकारों ने डच व अंग्रेज कंपनी अभिलेखों के आधार पर इस काल में बंगाल की वस्त्र निर्यात अर्थव्यवस्था के पैमाने व संगठन का विस्तार से दस्तावेजीकरण किया है। कथन II गलत व अतिरंजित है: इतिहासकार सामान्यतः 1757 से काफी पूर्व वस्त्र उत्पादन संगठन के पक्षों (जैसे अग्रिम अनुबंध प्रणालियों) पर यूरोपीय व्यापारिक कंपनी के सार्थक, यद्यपि सीमा में विवादित, प्रभाव को दस्तावेजीकृत करते हैं, न कि इस पर सहमति है कि 'कोई सार्थक प्रभाव नहीं' था।
प्रश्न 46. दक्कन क्षेत्र के बलुतेदारों (ग्राम सेवकों व शिल्पकारों) के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? (A) बलुतेदार पारंपरिक सेवाएँ प्रदान करने वाले ग्राम सेवक व शिल्पकार थे, (B) वतनदार बलुतेदारों को अपने कार्य व पारिश्रमिक पर एक स्थायी, वंशानुगत अधिकार था, (C) उपरी बलुतेदारों को कोई स्थायी अधिकार नहीं था तथा वे अधिक अस्थायी आधार पर सेवा करते थे
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: B) (A), (B) व (C)
तीनों कथन सही हैं तथा दक्कन बलुतेदारी व्यवस्था के मानक इतिहास-लेखन वर्णन को दर्शाते हैं: बलुतेदार पारंपरिक ग्राम सेवक/शिल्पकार थे (A), वतनदार बलुतेदारों को अपने पद व पारिश्रमिक पर स्थायी वंशानुगत अधिकार था (B), तथा इसके विपरीत उपरी बलुतेदारों को ऐसा कोई स्थायी अधिकार नहीं था, वे अधिक अस्थायी अथवा घुमंतू आधार पर सेवा करते थे (C)।
प्रश्न 47. मध्यकालीन भारतीय संस्था 'बंजारा' (घुमंतू अनाज/वस्तु वाहक) के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
I. उन्होंने मुगल सैन्य अभियानों की आपूर्ति सहित लंबी दूरी तक अनाज व वस्तुओं के परिवहन में एक महत्वपूर्ण साजो-सामान संबंधी भूमिका निभाई।
II. वे केवल निश्चित, छोटे स्थानीय परिपथों में संचालित होते थे, बिना दीर्घ-दूरी अंतर-क्षेत्रीय व्यापार में किसी भागीदारी के।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: C) केवल I सही है
कथन I सही है: बंजारों ने घुमंतू व्यापारियों व वाहकों के रूप में एक महत्वपूर्ण साजो-सामान संबंधी भूमिका निभाई, मुगल सैन्य अभियानों हेतु आवश्यक आपूर्ति-शृंखला समर्थन प्रदान करने सहित लंबी दूरी तक अनाज व वस्तुओं का परिवहन किया। कथन II गलत है तथा विस्तृत दीर्घ-दूरी, अंतर-क्षेत्रीय व्यापार नेटवर्कों में उनकी सुदस्तावेजीकृत भूमिका का प्रत्यक्ष खंडन करता है।
प्रश्न 48. मध्यकालीन भारतीय 'दास्तानगोई' (कहानी-कथन) परंपरा के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
I. यह उर्दू/फारसी में प्रस्तुत की जाने वाली एक मौखिक कहानी-कथन कला थी, जो प्रायः दास्तान-ए-अमीर हमज़ा जैसी वीरतापूर्ण व साहसिक कथाओं का वर्णन करती थी।
II. इसका दरबारी अथवा अभिजात संरक्षण से कोई संबंध नहीं था तथा यह विशेष रूप से एक ग्राम-स्तरीय लोक प्रथा थी।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: D) केवल I सही है
कथन I सही है: दास्तानगोई उर्दू/फारसी में प्रस्तुत की जाने वाली एक मौखिक कहानी-कथन परंपरा थी, जिसमें दास्तान-ए-अमीर हमज़ा जैसी कथाएँ अपनी वीरतापूर्ण, साहसिक विषयवस्तु हेतु विशेष रूप से प्रसिद्ध थीं। कथन II गलत है: दास्तानगोई को व्यापक लोकप्रिय दर्शकों के अतिरिक्त पर्याप्त दरबारी व अभिजात संरक्षण भी प्राप्त हुआ, न कि यह विशेष रूप से एक ग्राम-स्तरीय प्रथा थी।
प्रश्न 49. निम्नलिखित में से कौन-सा क्षेत्रीय मध्यकालीन राज्य व उसकी उल्लेखनीय धार्मिक/सांस्कृतिक विशेषता का युग्म गलत है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: D) शाह मीर के अधीन कश्मीर राज्य — विशेष रूप से अद्वैत वेदांत का पालन, बिना किसी इस्लामी धार्मिक उपस्थिति के
कश्मीर का शाह मीर राजवंश वास्तव में एक इस्लामी शासक राजवंश था, तथा बिना किसी इस्लामी धार्मिक उपस्थिति के विशेष रूप से अद्वैत वेदांत के पालन का दावा तथ्यात्मक रूप से गलत व विरोधाभासी है — यह युग्म गलत है। शेष तीन युग्म आहोम राज्य, गजपति राज्य तथा मेवाड़ की धार्मिक/सांस्कृतिक संबद्धताओं का सही वर्णन करते हैं।
प्रश्न 50. सूची I (पुस्तकें) का सूची II (विषयवस्तु) से मिलान कीजिए: (A) निज़ामी-ए-अंजुम, (B) तुहफत-उल-हिंद, (C) दबिस्तान-ए-मज़ाहिब, (D) रिसाला-मिकदारिया, के साथ (I) माप-तौल, (II) हिंदू ज्योतिष, (III) हिंदू अलंकार-शास्त्र, (IV) धर्म व संप्रदाय
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: B) (A)-(II), (B)-(III), (C)-(IV), (D)-(I)
सही मिलान है: निज़ामी-ए-अंजुम — हिंदू ज्योतिष पर (II), तुहफत-उल-हिंद — हिंदू अलंकार-शास्त्र पर (III), दबिस्तान-ए-मज़ाहिब — धर्मों व संप्रदायों पर (IV), तथा रिसाला-मिकदारिया — माप-तौल पर (I) — यह मध्यकालीन-प्रारंभिक आधुनिक काल में भारतीय विद्या व समाज के पक्षों पर रचित विशिष्ट फारसी-भाषा कृतियों का एक समूह है।
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प्रश्न 51. 'सिक्स मंथ्स इन इंडिया' के लेखक कौन हैं, जो 19वीं शताब्दी के भारत पर यूरोपीय यात्रा/अवलोकन साहित्य में उद्धृत एक विवरण है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: B) मेरी कारपेंटर
एक अंग्रेज सामाजिक सुधारक व शिक्षाविद्, मेरी कारपेंटर ने 'सिक्स मंथ्स इन इंडिया' रचा, जो एक अवलोकनात्मक यात्रा-विवरण है, जो विशेष रूप से 19वीं शताब्दी में भारत की उनकी यात्राओं के दौरान महिला शिक्षा व सामाजिक परिस्थितियों पर अपने ध्यान हेतु उल्लेखनीय है।
प्रश्न 52. मध्यकालीन व प्रारंभिक आधुनिक भारत हेतु ऐतिहासिक स्रोतों के रूप में यूरोपीय यात्रा-विवरणों की विश्वसनीयता के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
I. इतिहासकार सामान्यतः विदेशी पर्यवेक्षकों द्वारा संभावित सांस्कृतिक पूर्वाग्रह अथवा गलतफहमी के कारण यात्रा-विवरणों की स्वदेशी स्रोतों से क्रॉस-चेकिंग करते हैं।
II. यात्रा-विवरणों को ऐतिहासिक साक्ष्य के रूप में पूर्णतः निरर्थक माना जाता है तथा गंभीर इतिहास-लेखन से बहिष्कृत किया जाता है।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: A) केवल I सही है
कथन I सही है: मानक इतिहास-लेखन व्यवहार में संभावित सांस्कृतिक पूर्वाग्रह अथवा गलत व्याख्या को ध्यान में रखते हुए यूरोपीय यात्रा-विवरणों की स्वदेशी फारसी, संस्कृत अथवा क्षेत्रीय-भाषा स्रोतों से क्रॉस-रेफरेंसिंग सम्मिलित है। कथन II गलत व अतिरंजित है — अपनी सीमाओं के बावजूद, यात्रा-विवरण मूल्यवान व व्यापक रूप से प्रयुक्त स्रोत बने हुए हैं, न कि गंभीर ऐतिहासिक विद्वता से बहिष्कृत।
प्रश्न 53. निम्नलिखित में से कौन-सा औपनिवेशिक आर्थिक आयोग/जाँच व उसका प्रमुख फोकस का युग्म गलत है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: A) साइमन आयोग — विशेष रूप से बंगाल जूट उद्योग की अर्थव्यवस्था की जाँच, बिना किसी संवैधानिक अधिदेश के
साइमन आयोग वास्तव में भारतीय स्वशासन की संभावनाओं की जाँच करने वाला एक संवैधानिक समीक्षा आयोग था, न कि जूट उद्योग पर केंद्रित एक आर्थिक जाँच — यह युग्म गलत है। शेष तीन युग्म श्रम पर राजकीय आयोग, भारतीय टैरिफ बोर्ड, तथा केंद्रीय बैंकिंग जाँच समिति का सही वर्णन करते हैं।
प्रश्न 54. 31 अगस्त 1920 को स्थापित अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) के प्रथम अध्यक्ष कौन थे?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: B) लाला लाजपत राय
लाला लाजपत राय ने 31 अगस्त 1920 को स्थापित अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस के प्रथम अध्यक्ष के रूप में कार्य किया, जो व्यापक राष्ट्रवादी संघर्ष के साथ-साथ भारतीय श्रमिक आंदोलन के संगठन में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है।
प्रश्न 55. औपनिवेशिक भारतीय आर्थिक इतिहास हेतु स्रोतों के रूप में व्यापार/प्रबंध अभिकरण अभिलेखों के मूल्य के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
I. ब्रिटिश प्रबंध अभिकरणों (जैसे जूट अथवा चाय में संचालित) के अभिलेख औपनिवेशिक औद्योगिक संगठन व लाभप्रदता संबंधी मूल्यवान आँकड़े प्रदान करते हैं।
II. औपनिवेशिक काल से किसी भी प्रकार के कोई प्रबंध अभिकरण अभिलेख उपलब्ध नहीं हुए, जिससे इतिहासकार ऐसी किसी भी प्राथमिक स्रोत सामग्री से पूर्णतः वंचित रह गए।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: C) केवल I सही है
कथन I सही है: जूट व चाय जैसे उद्योगों में सक्रिय ब्रिटिश प्रबंध अभिकरणों के उपलब्ध अभिलेख औपनिवेशिक औद्योगिक संगठन, निवेश प्रतिरूपों तथा लाभप्रदता का अध्ययन करने वाले इतिहासकारों हेतु मूल्यवान मात्रात्मक व गुणात्मक आँकड़े प्रदान करते हैं। कथन II गलत है: यद्यपि अभिलेखीय अस्तित्व असमान है, प्रबंध अभिकरण अभिलेख विभिन्न अभिलेखागारों व कंपनी इतिहासों में उपलब्ध हुए हैं, जो इतिहासकारों को वास्तविक प्राथमिक स्रोत सामग्री प्रदान करते हैं।
प्रश्न 56. 1917/1918 का 'चंपारण कृषि अधिनियम', गांधीजी के चंपारण सत्याग्रह का एक विधायी परिणाम, मुख्यतः किसे संबोधित करता था?
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उत्तर: C) तिनकठिया व्यवस्था की अनिवार्य नील खेती आवश्यकता की समाप्ति
चंपारण कृषि अधिनियम, गांधीजी के 1917 सत्याग्रह तथा बाद की आधिकारिक जाँच का एक प्रत्यक्ष विधायी परिणाम, मुख्यतः तिनकठिया व्यवस्था के अंतर्गत अनिवार्य नील खेती आवश्यकता की समाप्ति को संबोधित करता था, जो प्रभावित कृषक वर्ग को महत्वपूर्ण, यद्यपि आंशिक, राहत प्रदान करता था।
प्रश्न 57. अभिकथन (A): 1916 का लखनऊ समझौता कांग्रेस-लीग सहयोग के एक महत्वपूर्ण, यद्यपि अस्थायी, क्षण के रूप में माना जाता है।
कारण (R): इसमें कांग्रेस ने औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध एक संयुक्त कांग्रेस-लीग राजनीतिक मोर्चे के बदले मुसलमानों हेतु पृथक निर्वाचिका के सिद्धांत को स्वीकार किया।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: A) A और R दोनों सत्य हैं, तथा R, A की सही व्याख्या है
दोनों कथन सही व परस्पर संबद्ध हैं: लखनऊ समझौता कांग्रेस-मुस्लिम लीग राजनीतिक सहयोग का एक उल्लेखनीय, यद्यपि अंततः अल्पजीवी, क्षण था, तथा यह सहयोग मूलतः एक संयुक्त राजनीतिक मोर्चा सुरक्षित करने के मूल्य के रूप में मुसलमानों हेतु पृथक निर्वाचिका की कांग्रेस की स्वीकृति पर निर्मित था, जो R को A की एक वैध व्याख्या बनाता है।
प्रश्न 58. औपनिवेशिक-कालीन 'गृह प्रभार' में, अन्य घटकों के साथ, किस श्रेणी के ऋण पर ब्याज भुगतान सम्मिलित थे?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: C) इंग्लैंड में जुटाया गया भारत-संबंधी सार्वजनिक ऋण, जिसमें रेलवे गारंटी दायित्व सम्मिलित हैं
'गृह प्रभार' के विभिन्न घटकों में, इंग्लैंड में जुटाए गए भारत-संबंधी सार्वजनिक ऋण पर ब्याज भुगतान सम्मिलित थे — जिसमें रेलवे गारंटी व्यवस्था से जुड़े दायित्व सम्मिलित हैं — जो नौरोजी की व्यापक आर्थिक आलोचना में पहचाने गए भारतीय राजस्व पर एक पर्याप्त व निरंतर अपवाह का निर्माण करता था।
प्रश्न 59. औपनिवेशिक-कालीन 'न्यासिता' विचारधारा (भारत के विकास हेतु न्यास में शासन करने के ब्रिटिश दावे) के इतिहास-लेखन के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
I. राष्ट्रवादी तथा बाद के उत्तर-औपनिवेशिक इतिहासकारों ने न्यासिता अलंकार की आलोचनात्मक रूप से जाँच की है, यह तर्क देते हुए कि यह प्रायः पितृसत्तात्मक औचित्यीकरण के पीछे वास्तविक शोषणकारी आर्थिक संबंधों को छिपाता था।
II. सभी इतिहासकार, बिना किसी अपवाद के, न्यासिता दावों को औपनिवेशिक आर्थिक नीति के वास्तविक प्रभावों के एक सटीक वर्णन के रूप में अंकित मूल्य पर स्वीकार करते हैं।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: C) केवल I सही है
कथन I सही है: राष्ट्रवादी तथा बाद के उत्तर-औपनिवेशिक इतिहासकारों ने औपनिवेशिक 'न्यासिता' अलंकार की आलोचनात्मक रूप से जाँच की है, यह तर्क देते हुए कि यह प्रायः एक पितृसत्तात्मक, विकासात्मक औचित्यीकरण के पीछे वास्तव में शोषणकारी आर्थिक संबंधों को छिपाने का कार्य करता था। कथन II गलत व अतिरंजित है: यह आलोचनात्मक इतिहास-लेखन जाँच ठीक वही है जिसने इस विषय पर अधिकांश विद्वता को चिह्नित किया है, न कि न्यासिता दावों की अंकित मूल्य पर अनालोचनात्मक स्वीकृति।
प्रश्न 60. ऐतिहासिक स्रोतों के रूप में फोटोग्राफिक अभिलेखागारों (जैसे औपनिवेशिक-कालीन फोटोग्राफी) के मूल्य के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
I. फोटोग्राफ मूल्यवान दृश्य दस्तावेजीकरण प्रदान कर सकते हैं, किंतु इतिहासकारों को फोटोग्राफर के दृष्टिकोण, आशय तथा चयन विकल्पों पर विचार करना चाहिए।
II. फोटोग्राफों को पूर्णतः वस्तुनिष्ठ, अमध्यस्थ अभिलेख माना जाता है, बिना किसी आलोचनात्मक व्याख्या की आवश्यकता के।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: C) केवल I सही है
कथन I सही है: इतिहासकार फोटोग्राफिक अभिलेखागारों को मूल्यवान दृश्य दस्तावेजीकरण के रूप में मान्यता देते हैं जबकि फोटोग्राफर के दृष्टिकोण, रचनात्मक विकल्पों तथा आशय पर आलोचनात्मक रूप से विचार करने की आवश्यकता पर भी बल देते हैं (उदाहरणार्थ, औपनिवेशिक-कालीन फोटोग्राफी प्रायः विशेष नृजातीयविज्ञानीय अथवा प्रशासनिक प्रस्तुतियों को दर्शाती थी)। कथन II गलत है: फोटोग्राफ, किसी भी ऐतिहासिक स्रोत की भाँति, पूर्णतः वस्तुनिष्ठ, अमध्यस्थ अभिलेख के रूप में माने जाने के बजाय आलोचनात्मक व्याख्या की आवश्यकता रखते हैं।
प्रश्न 61. औपनिवेशिक भारत पर लागू 'विऔद्योगीकरण' शब्द सर्वाधिक निकटता से किस विशिष्ट पारंपरिक उद्योग के पतन से जुड़ा है, जिसका प्रमाण 19वीं शताब्दी में इसमें कार्यरत कार्यबल के सिकुड़ते अनुपात से मिलता है?
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उत्तर: B) हथकरघा वस्त्र बुनाई
औपनिवेशिक आर्थिक इतिहास-लेखन में विऔद्योगीकरण बहसें सर्वाधिक केंद्रीय रूप से भारत के पारंपरिक हथकरघा वस्त्र बुनाई उद्योग के पतन पर केंद्रित हैं, क्योंकि शिल्पकार सूती बुनकरों को ब्रिटिश मशीन-निर्मित वस्त्रों से तीव्र प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा, तथा जनगणना आँकड़े 19वीं शताब्दी में इस पारंपरिक शिल्प में कार्यरत कार्यबल के घटते अनुपात को दर्शाते हैं।
प्रश्न 62. निम्नलिखित में से कौन-सा औपनिवेशिक आर्थिक इतिहासकार व उसकी केंद्रीय विश्लेषणात्मक अवधारणा का युग्म गलत है?
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उत्तर: B) विलियम डिग्बी — 'प्रॉस्परस ब्रिटिश इंडिया' औपनिवेशिक आर्थिक नीति के सकारात्मक समर्थन के रूप में
विलियम डिग्बी की कृति 'प्रॉस्परस ब्रिटिश इंडिया' वास्तव में एक गहन आलोचनात्मक, विडंबनापूर्ण शीर्षक वाली कृति थी जो औपनिवेशिक नीति द्वारा उत्पन्न आर्थिक संकट को उजागर करती है, न कि इसका सकारात्मक समर्थन — यह युग्म गलत है। शेष तीन युग्म प्रत्येक इतिहासकार के केंद्रीय विश्लेषणात्मक योगदान को सही रूप से पहचानते हैं।
प्रश्न 63. अभिकथन (A): 1872 से आगे की औपनिवेशिक जनगणना संचालन को इतिहासकार केवल जनसांख्यिकीय आँकड़ों हेतु ही नहीं, बल्कि सामाजिक श्रेणियों को आकार देने में उनकी भूमिका हेतु भी महत्वपूर्ण मानते हैं।
कारण (R): कुछ इतिहासकार तर्क देते हैं कि जाति व धर्म के जनगणना-वर्गीकरण ने औपनिवेशिक भारत में इन पहचानों के दृढ़ीकरण व राजनीतिकरण में योगदान दिया।
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उत्तर: B) A और R दोनों सत्य हैं, तथा R, A की सही व्याख्या है
दोनों कथन सही व परस्पर संबद्ध हैं: औपनिवेशिक जनगणना संचालन का अध्ययन करने वाले इतिहासकार तर्क देते हैं कि जाति व धर्म के आधार पर जनसंख्या की गणना व वर्गीकरण की प्रक्रिया ने — केवल पूर्व-विद्यमान श्रेणियों को दर्ज करने से परे — इन सामाजिक पहचानों को तीव्र करने, औपचारिक बनाने तथा कुछ मामलों में राजनीतिकृत करने में सक्रिय रूप से योगदान दिया, जो R को A की एक वैध व्याख्या बनाता है।
प्रश्न 64. खिलाफत आंदोलन (1919-1924) के इतिहास-लेखन के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
I. कुछ इतिहासकार खिलाफत उद्देश्य हेतु गांधीजी के समर्थन को औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध हिंदू-मुस्लिम एकता निर्मित करने के एक रणनीतिक प्रयास के रूप में देखते हैं।
II. अन्य इतिहासकारों ने इस गठबंधन की अंततः नाजुकता की आलोचना की है, क्योंकि यह भारतीय संवैधानिक माँगों से सीमित प्रत्यक्ष संबंध वाले एक अखिल-इस्लामिक धार्मिक उद्देश्य के इर्द-गिर्द निर्मित था।
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उत्तर: A) I और II दोनों सही हैं
दोनों कथन सही हैं तथा खिलाफत आंदोलन पर वास्तविक, सह-अस्तित्व वाले इतिहास-लेखन दृष्टिकोणों को दर्शाते हैं — कुछ इतिहासकार हिंदू-मुस्लिम एकता निर्मित करने की गांधीजी की रणनीतिक दृष्टि पर बल देते हैं, जबकि अन्य ने घरेलू भारतीय राजनीतिक माँगों से कुछ हद तक असंबद्ध एक अखिल-इस्लामिक उद्देश्य पर इसकी नींव को देखते हुए गठबंधन की अंतर्निहित नाजुकता को आलोचनात्मक रूप से नोट किया है, यह नाजुकता बाद में आंदोलन के चौरी-चौरा-पश्चात व खिलाफत-उन्मूलन-पश्चात पतन से उजागर हुई।
प्रश्न 65. निम्नलिखित में से कौन-सा आधुनिक भारतीय राष्ट्रवादी जीवनी/आत्मकथा व उसके विषय का युग्म गलत है?
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उत्तर: C) 'अंबेडकर: टुवर्ड्स एन एनलाइटन्ड इंडिया' — बी.आर. अंबेडकर के बारे में, भीखू पारेख द्वारा रचित, जो विशेष रूप से उनके क्रिकेट करियर पर केंद्रित है, बिना जाति की किसी चर्चा के
अंबेडकर पर भीखू पारेख की कृति केंद्रीय रूप से उनके राजनीतिक चिंतन व सामाजिक सुधार कार्य को संबोधित करती है, विशेषतः जाति के संबंध में — 'उनके क्रिकेट करियर पर विशेष केंद्रण, बिना जाति की किसी चर्चा के' का दावा तथ्यात्मक रूप से हास्यास्पद व गलत है। शेष तीन युग्म इन जीवनी कृतियों को उनके विषयों व लेखकों से सही रूप से पहचानते हैं।
प्रश्न 66. एक सामान्य इतिहास-लेखन वर्गीकरण के अनुसार, निम्नलिखित आंदोलन-धाराओं में से कौन-सी एक-दूसरे के समानांतर किंतु वैकल्पिक नहीं थीं: (A) गदर आंदोलन, (B) सविनय अवज्ञा आंदोलन, (C) INA, (D) RIN विद्रोह?
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उत्तर: A) केवल (A), (C), व (D)
यह इतिहास-लेखन वर्गीकरण सविनय अवज्ञा आंदोलन (B) व RIN विद्रोह (D) को समानांतर किंतु वैकल्पिक नहीं धाराओं के रूप में पहचानता है — दोनों मुख्यधारा कांग्रेस-संबद्ध व परवर्ती नौसैनिक विद्रोह आंदोलन ने स्वतंत्रता हेतु संचयी दबाव में योगदान दिया, जो गदर आंदोलन व INA जैसी पृथक रूप से संगठित, अधिक प्रत्यक्ष रूप से उग्रवादी धाराओं से भिन्न है।
प्रश्न 67. औपनिवेशिक-कालीन 'दक्कन कृषक राहत अधिनियम' (1879) मुख्यतः किस उद्देश्य हेतु था?
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उत्तर: A) ऋणग्रस्त कृषकों को विधिक सुरक्षा प्रदान करना, जिसमें कुछ परिस्थितियों में साहूकारों द्वारा भूमि-जब्ती पर प्रतिबंध सम्मिलित हैं
1875 के दक्कन दंगों के प्रत्युत्तर में अधिनियमित 1879 का दक्कन कृषक राहत अधिनियम मुख्यतः ऋणग्रस्त कृषकों को विधिक सुरक्षा प्रदान करने हेतु था, जिसमें ऋण-वसूली हेतु कृषक भूमि जब्त करने की साहूकारों की क्षमता पर कुछ प्रतिबंध सम्मिलित थे, यद्यपि इसकी व्यावहारिक प्रभावशीलता पर आर्थिक इतिहासकारों द्वारा बहस की गई है।
प्रश्न 68. निम्नलिखित औपनिवेशिक आर्थिक नीति हस्तक्षेपों को कालानुक्रम में व्यवस्थित कीजिए: (A) चंपारण कृषि अधिनियम, (B) पंजाब भूमि अलगाव अधिनियम, (C) भारत में श्रम पर राजकीय आयोग, (D) कंपनी एकाधिकार को समाप्त करने वाला चार्टर एक्ट
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उत्तर: A) (D), (B), (A), (C)
सही कालानुक्रम है: कंपनी व्यापार एकाधिकार को समाप्त करने वाला चार्टर एक्ट (1813), पंजाब भूमि अलगाव अधिनियम (1900), चंपारण कृषि अधिनियम (1917/1918), तथा भारत में श्रम पर राजकीय आयोग (1929-31)।
प्रश्न 69. भारत में औपनिवेशिक रेलवे विस्तार के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
I. रेलवे निर्माण का महत्वपूर्ण वित्तपोषण ब्रिटिश निवेशकों को गारंटीकृत प्रतिफल की एक व्यवस्था के माध्यम से हुआ, जिसे भारतीय राजस्व से वित्तपोषित किया गया।
II. रेलवे माल-भाड़ा दर संरचनाएँ सामान्यतः भारतीय अंतर-क्षेत्रीय व्यापार की तुलना में बंदरगाहों की ओर भारतीय कच्चे माल की आवाजाही को प्राथमिकता देने हेतु डिज़ाइन की गई थीं।
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उत्तर: C) I और II दोनों सही हैं
दोनों कथन सही हैं। गारंटी प्रणाली ने वास्तविक लाभप्रदता की परवाह किए बिना ब्रिटिश रेलवे निवेशकों को भारतीय कर राजस्व से वित्तपोषित एक निश्चित न्यूनतम प्रतिफल सुनिश्चित किया, तथा आर्थिक इतिहासकारों ने दस्तावेजीकृत किया है कि औपनिवेशिक-कालीन माल-भाड़ा संरचनाएँ प्रायः भारतीय अंतर-क्षेत्रीय व्यापार को सुगम बनाने की तुलना में बंदरगाहों की ओर कच्चे माल की निर्यात-उन्मुख आवाजाही को प्राथमिकता देती थीं।
प्रश्न 70. ब्रिटिश शासन के अंतिम वर्षों की निम्नलिखित घटनाओं को कालानुक्रम में व्यवस्थित कीजिए: (A) क्रिप्स मिशन, (B) वेवेल योजना/शिमला सम्मेलन, (C) माउंटबेटन योजना, (D) प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस
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उत्तर: B) (A), (B), (D), (C)
सही कालानुक्रम है: क्रिप्स मिशन (1942), वेवेल योजना/शिमला सम्मेलन (1945), प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस (अगस्त 1946), तथा माउंटबेटन योजना (जून 1947)।
प्रश्न 71. ईस्ट इंडिया कंपनी शासन के अंतर्गत अफीम व्यापार के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
I. बंगाल व बिहार में अफीम की खेती को एक कठोर राजकीय एकाधिकार व्यवस्था के अंतर्गत रखा गया था।
II. चीन को अफीम निर्यात कंपनी के व्यापार खातों को संतुलित करने के प्रयासों का एक महत्वपूर्ण घटक था।
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उत्तर: A) I और II दोनों सही हैं
दोनों कथन सही हैं। ईस्ट इंडिया कंपनी बंगाल व बिहार में अफीम की खेती व प्रसंस्करण पर एक कठोर एकाधिकार संचालित करती थी, तथा परिणामी चीन को निर्यात ने चीनी चाय के आयात से उत्पन्न कंपनी के व्यापार घाटे की भरपाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो कुख्यात 'त्रिकोणीय व्यापार' प्रणाली का एक केंद्रीय स्तंभ था।
प्रश्न 72. इतिहासकार बिपन चंद्र की 'औपनिवेशिक वर्चस्व' (कोलोनियल हेजेमनी) अवधारणा के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
I. यह विश्लेषण करती है कि औपनिवेशिक शासन ने नियंत्रण को केवल बलपूर्वक ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक, वैचारिक व संस्थागत सहमति-निर्माण तंत्रों के माध्यम से भी कैसे बनाए रखा।
II. यह अवधारणा एंटोनियो ग्राम्शी के सांस्कृतिक वर्चस्व सिद्धांत को स्पष्ट रूप से अस्वीकार करती है तथा उससे कोई संबंध नहीं रखती।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: A) केवल I सही है
कथन I सही है: बिपन चंद्र का औपनिवेशिक वर्चस्व विश्लेषण इस बात की जाँच करता है कि ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन ने नियंत्रण को केवल बलपूर्वक शक्ति के माध्यम से ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक, वैचारिक व संस्थागत सहमति-निर्माण तंत्रों के माध्यम से कैसे बनाए रखा। कथन II गलत है: यह अवधारणा वास्तव में एंटोनियो ग्राम्शी के सांस्कृतिक वर्चस्व सिद्धांत से पर्याप्त रूप से प्रेरित है तथा उस पर आधारित है, जिसे भारत में औपनिवेशिक शासन के विशिष्ट विश्लेषण हेतु अनुकूलित किया गया है।
प्रश्न 73. औपनिवेशिक-कालीन 'प्रांतीय बैंकिंग जाँच समितियों' (केंद्रीय बैंकिंग जाँच समिति, 1929-30 के साथ स्थापित) के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
I. उन्होंने ब्रिटिश भारत के विभिन्न प्रांतों में साख उपलब्धता, ऋणग्रस्तता तथा बैंकिंग अवसंरचना में क्षेत्रीय भिन्नताओं की जाँच की।
II. उन्होंने पाया कि ग्रामीण साख स्थितियाँ प्रत्येक एकल प्रांत में पूर्णतः एकसमान व समान थीं, बिना किसी सार्थक क्षेत्रीय भिन्नता के।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: A) केवल I सही है
कथन I सही है: प्रांतीय बैंकिंग जाँच समितियों ने व्यापक केंद्रीय बैंकिंग जाँच प्रक्रिया के भाग के रूप में ब्रिटिश भारत के विभिन्न प्रांतों में साख उपलब्धता, ऋणग्रस्तता प्रतिरूपों तथा बैंकिंग अवसंरचना में क्षेत्रीय भिन्नताओं की जाँच की। कथन II गलत व अतिरंजित है: इन समितियों ने साख स्थितियों व ऋणग्रस्तता में पर्याप्त क्षेत्रीय भिन्नता दस्तावेजीकृत की, न कि उन्होंने हर जगह एकसमान, समान स्थितियाँ पाईं।
प्रश्न 74. 'अखिल भारतीय मुस्लिम लीग का लाहौर प्रस्ताव (1940)', जो विभाजन के इतिहास-लेखन हेतु एक महत्वपूर्ण प्राथमिक स्रोत है, मुख्यतः किस कारण महत्वपूर्ण है?
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उत्तर: D) उपमहाद्वीप के मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों वाले स्वायत्त, संप्रभु राज्यों की माँग को औपचारिक रूप से व्यक्त करना (बाद में पाकिस्तान की माँग के रूप में व्याख्यायित)
1940 का लाहौर प्रस्ताव मुख्यतः उपमहाद्वीप के मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों वाले स्वायत्त, संप्रभु राज्यों की माँग को औपचारिक रूप से व्यक्त करने हेतु महत्वपूर्ण है — एक प्रस्ताव जिसे बाद में पाकिस्तान के एक पृथक राज्य की विशिष्ट माँग में व्याख्यायित व विकसित किया गया, जो इसे विभाजन इतिहास-लेखन हेतु एक आधारभूत प्राथमिक स्रोत बनाता है।
प्रश्न 75. औपनिवेशिक शासन के अंतर्गत कृषि के व्यवसायीकरण के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
I. नील, कपास व जूट जैसी नकदी फसलें स्थानीय जीविका आवश्यकताओं के बजाय बढ़ती हुई मात्रा में निर्यात हेतु उगाई जाने लगीं।
II. इस व्यवसायीकरण ने सभी क्षेत्रों में कृषक वर्ग के आर्थिक कल्याण में एकसमान रूप से सुधार किया।
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उत्तर: B) केवल I सही है
कथन I सही है: कृषि के औपनिवेशिक-कालीन व्यवसायीकरण ने स्थानीय खाद्य आवश्यकताओं के बजाय निर्यात बाजारों हेतु नकदी फसलों की बढ़ती खेती को जन्म दिया। कथन II गलत व अतिरंजित है: इतिहासकार व्यापक रूप से दस्तावेजीकृत करते हैं कि इस बदलाव ने प्रायः कृषक वर्ग की मूल्य-उतार-चढ़ाव, ऋण व खाद्य असुरक्षा के प्रति संवेदनशीलता को बढ़ाया, न कि कल्याण में एकसमान रूप से सुधार किया।
इतिहासलेखन
प्रश्न 76. निम्नलिखित में से कौन-सा इतिहास-लेखन विद्यालय/सिद्धांतकार व उसकी प्रमुख भौगोलिक/राष्ट्रीय संबद्धता का युग्म गलत है?
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उत्तर: B) रांकीय ऐतिहासिकतावाद — मूलतः संयुक्त राज्य अमेरिका से संबद्ध, जर्मनी से बिल्कुल कोई संबंध नहीं
लियोपोल्ड फॉन रांके से संबद्ध रांकीय ऐतिहासिकतावाद वास्तव में जर्मनी में उत्पन्न हुआ तथा मुख्यतः उससे संबद्ध है, न कि संयुक्त राज्य अमेरिका से — यह युग्म गलत व तथ्यात्मक रूप से उल्टा है। शेष तीन युग्म अनाल स्कूल, ब्रिटिश मार्क्सवादी इतिहासकारों तथा सबाल्टर्न स्टडीज़ को उनकी संबंधित भौगोलिक/राष्ट्रीय संबद्धताओं से सही रूप से पहचानते हैं।
प्रश्न 77. अभिकथन (A): लैंगिक इतिहास के इतिहासकार पूर्व-आधुनिक ऐतिहासिक स्रोतों को लिंग-भूमिकाओं संबंधी अपरीक्षित आधुनिक धारणाओं के साथ पढ़ने के प्रति सावधान करते हैं।
कारण (R): पूर्ववर्ती ऐतिहासिक कालों में लिंग व सामाजिक संगठन की श्रेणियाँ समकालीन ढाँचों पर सुव्यवस्थित रूप से फिट नहीं हो सकतीं, जिसके लिए सावधानीपूर्ण, संदर्भ-सजग ऐतिहासिक विश्लेषण की आवश्यकता है।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: A) A और R दोनों सत्य हैं, तथा R, A की सही व्याख्या है
दोनों कथन सही व परस्पर संबद्ध हैं: पूर्व-आधुनिक स्रोतों पर अपरीक्षित आधुनिक प्रक्षेपणों के प्रति लैंगिक इतिहासकारों की सावधानी इस पहचान से प्रत्यक्ष रूप से व्याख्यायित होती है कि पूर्ववर्ती कालों में लिंग श्रेणियाँ व सामाजिक संगठन प्रायः समकालीन ढाँचों से सुव्यवस्थित रूप से मेल नहीं खाते, जिसके लिए सावधानीपूर्ण संदर्भगत विश्लेषण की आवश्यकता है — जो R को A की एक वैध व्याख्या बनाता है।
प्रश्न 78. इतिहास-लेखन में 'अभिलेखीय मौन' (आर्काइवल साइलेंस) की अवधारणा के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
I. यह आधिकारिक अभिलेखीय रिकॉर्डों में कुछ समूहों की आवाज़ों व अनुभवों की व्यवस्थित अनुपस्थिति अथवा कम-प्रतिनिधित्व को संदर्भित करता है।
II. इतिहासकार अभिलेखीय मौन को पद्धतिगत रूप से अप्रासंगिक मानते हैं, जिसके लिए किसी विशेष व्याख्यात्मक रणनीति की आवश्यकता नहीं है।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: A) केवल I सही है
कथन I सही है: 'अभिलेखीय मौन' आधिकारिक अभिलेखागारों में हाशिए पर स्थित समूहों (महिलाओं, सबाल्टर्न वर्गों, उपनिवेशित लोगों) की आवाज़ों व अनुभवों की व्यवस्थित अनुपस्थिति अथवा कम-प्रतिनिधित्व को संदर्भित करता है, यह आलोचनात्मक इतिहास-लेखन हेतु केंद्रीय एक अवधारणा है। कथन II गलत है: इतिहासकार, विशेषतः सबाल्टर्न स्टडीज़ व नारीवादी इतिहास-लेखन से प्रभावित, अभिलेखीय मौन को अत्यंत पद्धतिगत रूप से महत्वपूर्ण मानते हैं, जिसे संबोधित करने हेतु विशिष्ट व्याख्यात्मक रणनीतियों (जैसे 'अन्न के विरुद्ध पठन') की आवश्यकता होती है।
प्रश्न 79. तुलनात्मक औपनिवेशिक इतिहास-लेखन (ब्रिटिश भारत की अन्य औपनिवेशिक संदर्भों, जैसे फ्रांसीसी इंडोचीन, डच इंडोनेशिया, से तुलना) के मूल्य के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
I. ऐसी तुलनाएँ इतिहासकारों को साम्राज्यों भर में सामान्य औपनिवेशिक शासन की विशेषताओं बनाम विशिष्ट औपनिवेशिक संदर्भों के लिए विशेष विशेषताओं की पहचान करने में सहायता कर सकती हैं।
II. इतिहासकार तुलनात्मक औपनिवेशिक अध्ययनों में किसी भी मूल्य को सार्वभौमिक रूप से अस्वीकार करते हैं, प्रत्येक औपनिवेशिक संदर्भ को किसी अन्य से पूर्णतः अतुलनीय मानते हुए।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: A) केवल I सही है
कथन I सही है: तुलनात्मक औपनिवेशिक इतिहास-लेखन, ब्रिटिश भारत की फ्रांसीसी इंडोचीन अथवा डच इंडोनेशिया जैसे अन्य औपनिवेशिक संदर्भों के साथ जाँच करते हुए, इतिहासकारों को विभिन्न साम्राज्यों भर में सामान्य औपनिवेशिक शासन की विशेषताओं को विशिष्ट औपनिवेशिक संदर्भों के लिए विशेष विशेषताओं से भिन्न करने में सहायता करता है, जो सामान्य व विशिष्ट औपनिवेशिक गतिकी दोनों की समझ को परिष्कृत करता है। कथन II गलत व अतिरंजित है: तुलनात्मक औपनिवेशिक अध्ययन एक वास्तव में मूल्यवान व उत्पादक इतिहास-लेखन दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करते हैं, न कि इसे सार्वभौमिक रूप से बिना किसी मूल्य के अस्वीकार किया जाता है।
प्रश्न 80. ऐतिहासिक शोध (क्लियोमेट्रिक्स) में सांख्यिकीय/मात्रात्मक पद्धतियों के प्रयोग के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
I. क्लियोमेट्रिक दृष्टिकोण ऐतिहासिक आँकड़ों, विशेषतः आर्थिक इतिहास पर, सांख्यिकीय व आर्थिक मॉडलिंग तकनीकों को लागू करते हैं।
II. क्लियोमेट्रिक पद्धतियों को अन्य इतिहासकारों से किसी भी पद्धतिगत आलोचना का सामना नहीं करना पड़ा।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: B) केवल I सही है
कथन I सही है: क्लियोमेट्रिक्स ऐतिहासिक आँकड़ों पर सांख्यिकीय व औपचारिक आर्थिक मॉडलिंग तकनीकों को लागू करता है, जो विशेष रूप से आर्थिक इतिहास शोध में प्रमुख है। कथन II गलत है: क्लियोमेट्रिक पद्धतियों को उन इतिहासकारों से पर्याप्त पद्धतिगत आलोचना का सामना करना पड़ा है जो पूर्व-आधुनिक कालों हेतु पर्याप्त मात्रात्मक आँकड़ों की उपलब्धता व विश्वसनीयता पर प्रश्न उठाते हैं, तथा गुणात्मक संदर्भ की कीमत पर परिमाणीकरण पर अत्यधिक निर्भरता के प्रति सावधान करते हैं।
प्रश्न 81. अपेक्षाकृत हाल के इतिहास-लेखन क्षेत्र 'पर्यावरणीय इतिहास' के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
I. यह ऐतिहासिक समय भर में मानव समाजों व प्राकृतिक पर्यावरण के बीच पारस्परिक संबंध की जाँच करता है।
II. भारतीय इतिहास के अध्ययन हेतु इसकी बिल्कुल कोई प्रासंगिकता नहीं है, यह केवल यूरोपीय व अमेरिकी ऐतिहासिक संदर्भों पर लागू होता है।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: C) केवल I सही है
कथन I सही है: पर्यावरणीय इतिहास ऐतिहासिक समय भर में मानव समाजों व प्राकृतिक पर्यावरण के बीच पारस्परिक संबंध की जाँच करता है, जिसमें वनोन्मूलन, जल-प्रबंधन तथा ऐतिहासिक घटनाओं पर जलवायु प्रभाव जैसे विषय सम्मिलित हैं। कथन II गलत है: पर्यावरणीय इतिहास को भारतीय ऐतिहासिक संदर्भों पर भी उत्पादक रूप से लागू किया गया है, जो औपनिवेशिक वन नीति, जल-प्रणालियों तथा उपमहाद्वीप में पारिस्थितिक परिवर्तन जैसे विषयों की जाँच करता है।
प्रश्न 82. मिशेल फूको जैसे सिद्धांतकारों से प्रभावित 'विमर्श विश्लेषण' की इतिहास-लेखन पद्धति के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
I. यह जाँचती है कि भाषा, श्रेणियाँ तथा प्रस्तुतीकरण के तरीके किसी दिए गए ऐतिहासिक काल में जो सोचा, कहा अथवा जाना जा सकता है, उसे कैसे आकार व सीमित करते हैं।
II. इसका औपनिवेशिक प्रशासनिक अथवा वैज्ञानिक ग्रंथों के अध्ययन से कोई अनुप्रयोग नहीं है, यह केवल साहित्यिक कल्पना हेतु प्रासंगिक है।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: A) केवल I सही है
कथन I सही है: फूको जैसे सिद्धांतकारों से प्रभावित विमर्श विश्लेषण यह जाँचता है कि भाषा, वर्गीकरण प्रणालियाँ तथा प्रस्तुतीकरण के तरीके किसी दिए गए ऐतिहासिक काल में वैध ज्ञान के रूप में जो सोचा, कहा अथवा जाना जा सकता है, उसे कैसे सक्रिय रूप से आकार व सीमित करते हैं। कथन II गलत है: विमर्श विश्लेषण को औपनिवेशिक प्रशासनिक व वैज्ञानिक ग्रंथों (उदाहरणार्थ, औपनिवेशिक नृजातीयविज्ञानीय अथवा चिकित्सा विमर्श की जाँच) पर उत्पादक रूप से लागू किया गया है, यह केवल साहित्यिक कल्पना तक सीमित नहीं है।
प्रश्न 83. निम्नलिखित में से कौन-सा इतिहास-लेखन अवधारणा व उसकी सही परिभाषा का युग्म गलत है?
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उत्तर: B) टेलियोलॉजी (ऐतिहासिक लेखन में) — एक पद्धति जो ऐतिहासिक परिवर्तन में दिशात्मकता अथवा उद्देश्य की किसी भी धारणा से कठोरता से बचती है
ऐतिहासिक लेखन में 'टेलियोलॉजी' वास्तव में एक ऐसे दृष्टिकोण को संदर्भित करता है जो यह मानता है कि इतिहास एक पूर्वनिर्धारित लक्ष्य, अंत-स्थिति अथवा उद्देश्य की ओर बढ़ता है — दिशात्मकता से बचने के विपरीत — जो इस युग्म को गलत बनाता है। शेष तीन शब्द (लॉन्ग ड्यूरे, ऐतिहासिकतावाद, प्रेज़ेंटिज़्म) सही रूप से परिभाषित हैं।
प्रश्न 84. गद्यांश 2 (प्रश्न 96-100): निम्नलिखित गद्यांश पढ़कर आगे दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
"किसी दस्तावेज़ को इस प्रकार मानने का प्रलोभन कि वह प्रस्तुत होते ही किसी प्रश्न का निपटारा कर देता है, ऐसा प्रलोभन है जिसका प्रत्येक इतिहासकार को प्रतिरोध करना चाहिए। एक दस्तावेज़ हमें अधिक से अधिक यह बताता है कि उसके लेखक ने क्या माना, दूसरों को क्या विश्वास दिलाना चाहा, अथवा दर्ज करना उसे सुविधाजनक लगा; यह अपने अस्तित्व की मात्र इस तथ्य से हमें यह नहीं बताता कि क्या घटित हुआ। इतिहासकार का कार्य दस्तावेज़ की खोज से आरंभ होता है, समाप्त नहीं, क्योंकि उस दस्तावेज़ को फिर पुष्टिकारक अथवा विरोधाभासी साक्ष्य के एक जाल के भीतर रखा जाना चाहिए, उसके लेखक के ज्ञात हितों व सीमाओं के विरुद्ध परखा जाना चाहिए, तथा उतनी ही सावधानी से यह पढ़ा जाना चाहिए कि वह क्या छोड़ता है जितनी सावधानी से यह कि वह क्या बताता है। जो इतिहासकार अभिलेखीय अस्तित्व को ऐतिहासिक महत्व के प्रतिनिधि के रूप में मानता है, वह जो घटित हुआ उसके इतिहास के बजाय जो दर्ज किया गया उसका इतिहास लिखने का जोखिम उठाता है — दो ऐसी परियोजनाएँ जो काफी हद तक अतिव्यापी हैं, किंतु कभी पूर्णतः एक समान नहीं होतीं।" गद्यांश के अनुसार, एक दस्तावेज़ हमें अधिक से अधिक क्या बताता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: B) उसके लेखक ने क्या माना, दूसरों को क्या विश्वास दिलाना चाहा, अथवा दर्ज करना उसे सुविधाजनक लगा
गद्यांश सीधे बताता है: 'एक दस्तावेज़ हमें अधिक से अधिक यह बताता है कि उसके लेखक ने क्या माना, दूसरों को क्या विश्वास दिलाना चाहा, अथवा दर्ज करना उसे सुविधाजनक लगा' — जो गद्यांश के अनुसार एक दस्तावेज़ की साक्ष्यात्मक सीमा का सटीक उत्तर देता है।
प्रश्न 85. अभिकथन (A): इतिहासकार पाठ्य स्रोतों के साथ-साथ भौतिक संस्कृति (वस्तुएँ, कलाकृतियाँ, रोज़मर्रा की वस्तुएँ) के अध्ययन के मूल्य को बढ़ती हुई मान्यता देते हैं।
कारण (R): भौतिक वस्तुएँ दैनिक जीवन, प्रौद्योगिकी तथा सामाजिक प्रथा के उन पक्षों को प्रकट कर सकती हैं जिन्हें लिखित अभिलेख, जो प्रायः साक्षर अभिजातों द्वारा निर्मित होते हैं, पूर्णतः नहीं समेट सकते।
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उत्तर: B) A और R दोनों सत्य हैं, तथा R, A की सही व्याख्या है
दोनों कथन सही व परस्पर संबद्ध हैं: भौतिक संस्कृति के मूल्य की इतिहासकारों की बढ़ती मान्यता सीधे इस तथ्य से व्याख्यायित होती है कि वस्तुएँ व कलाकृतियाँ उन समूहों (गैर-साक्षर अथवा हाशिए पर स्थित जनसंख्या सहित) के दैनिक जीवन, प्रौद्योगिकी तथा सामाजिक प्रथा के पक्षों को प्रकट कर सकती हैं जिन्हें लिखित अभिलेख — जो प्रायः साक्षर अभिजातों द्वारा निर्मित होते हैं तथा उनके दृष्टिकोण को दर्शाते हैं — पूर्णतः नहीं समेट सकते, जो R को A की एक वैध व्याख्या बनाता है।
प्रश्न 86. निम्नलिखित में से कौन-सा इतिहासकार व उसका उल्लेखनीय पद्धतिगत/विषयगत योगदान का युग्म गलत है?
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उत्तर: A) गियोर्ग इगर्स — इतिहास से भिन्न एक अनुशासन के रूप में पुरातत्व की स्थापना
गियोर्ग इगर्स एक इतिहासकार व इतिहासलेखक थे जो इतिहास-लेखन परंपराओं के तुलनात्मक अध्ययनों (विशेषतः 'हिस्टोरियोग्राफी इन द ट्वेंटीएथ सेंचुरी') हेतु जाने जाते थे, न कि एक अनुशासन के रूप में पुरातत्व की स्थापना हेतु — यह युग्म गलत है। शेष तीन युग्म ब्लॉक, ब्रॉदेल तथा हॉब्सबॉम को उनके संबंधित योगदानों से सही रूप से पहचानते हैं।
प्रश्न 87. 'संपूर्ण इतिहास विचारों का इतिहास है' (अथवा 'इतिहास चिंतन का इतिहास है') के कथन का श्रेय किस इतिहासकार को दिया जाता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: A) आर.जी. कॉलिंगवुड
आर.जी. कॉलिंगवुड को इस दृष्टिकोण को व्यक्त करने वाले कथन का श्रेय दिया जाता है कि इतिहास मूलतः चिंतन/विचारों का इतिहास है — यह उनके आदर्शवादी इतिहास-दर्शन का एक आधारभूत कथन है, जो अतीत की विचार-प्रक्रियाओं के पुनर्नाटयन की आवश्यकता संबंधी उनके व्यापक सिद्धांत से घनिष्ठ रूप से जुड़ा है।
प्रश्न 88. पद्धतिगत दृष्टिकोण के रूप में 'तुलनात्मक इतिहास' के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
I. इसमें प्रतिरूपों, समानताओं व भिन्नताओं की पहचान हेतु विभिन्न समाजों अथवा क्षेत्रों में ऐतिहासिक विकासों, संरचनाओं अथवा घटनाओं की व्यवस्थित तुलना सम्मिलित है।
II. तुलनात्मक इतिहास को एकल-क्षेत्र अध्ययनों की तुलना में पद्धतिगत रूप से निम्न माना जाता है तथा गंभीर इतिहासकारों द्वारा सामान्यतः इससे परहेज किया जाता है।
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उत्तर: C) केवल I सही है
कथन I सही है: तुलनात्मक इतिहास सार्थक प्रतिरूपों, समानताओं व भिन्नताओं की पहचान हेतु विभिन्न समाजों अथवा क्षेत्रों में ऐतिहासिक विकासों की व्यवस्थित रूप से जाँच करता है, यह एक पद्धति है जिसे मार्क ब्लॉक जैसे इतिहासकारों ने प्रवर्तित किया। कथन II गलत है: तुलनात्मक इतिहास एक सुस्थापित व मूल्यवान पद्धतिगत दृष्टिकोण है, न कि इसे निम्न माना जाता है अथवा गंभीर इतिहासकारों द्वारा सामान्यतः इससे परहेज किया जाता है।
प्रश्न 89. 'नीचे से इतिहास' (हिस्ट्री फ्रॉम बिलो) की अवधारणा, जो अभिजातों के बजाय सामान्य लोगों के अनुभवों पर बल देती है, ई.पी. थॉम्पसन जैसे इतिहासकारों द्वारा प्रवर्तित किस व्यापक इतिहास-लेखन परंपरा से सर्वाधिक निकटता से संबद्ध है?
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उत्तर: C) ब्रिटिश मार्क्सवादी सामाजिक इतिहास
'नीचे से इतिहास' ब्रिटिश मार्क्सवादी इतिहासकारों की परंपरा से सर्वाधिक निकटता से संबद्ध है, जिसमें ई.पी. थॉम्पसन की 'द मेकिंग ऑफ द इंग्लिश वर्किंग क्लास' एक मील का पत्थर उदाहरण है, जो मुख्यतः अभिजात राजनीतिक कर्ताओं पर केंद्रित होने के बजाय सामान्य कामकाजी लोगों की एजेंसी व जीवंत अनुभव पर बल देती है।
प्रश्न 90. गद्यांश 2 (प्रश्न 96-100): निम्नलिखित गद्यांश पढ़कर आगे दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
"किसी दिए गए वर्ष में किसी प्रांत के राजस्व का एक समग्र आँकड़ा उतना ही छिपाता है जितना यह प्रकट करता है। एक ही संख्या के पीछे बोझ का एक ऐसा वितरण निहित है जो धारण-आकार, निर्धारक अधिकारी से निकटता, तथा कृषक की पूर्ण भुगतान पर बातचीत अथवा उससे बचने की क्षमता के अनुसार बेहद भिन्न होता था; एक समान कुल राशि दर्ज करने वाले दो प्रांत पूर्णतः भिन्न सामाजिक प्रक्रियाओं के माध्यम से उस आँकड़े तक पहुँचे हो सकते हैं, एक व्यापक व अपेक्षाकृत समान निर्धारण के माध्यम से, दूसरा कम शक्तिशाली घरों की एक छोटी संख्या पर एक समतुल्य बोझ के संकेंद्रण के माध्यम से। जो आर्थिक इतिहासकार यह जाँचे बिना कि वह समग्र वास्तव में कैसे संघटित व एकत्रित हुआ, समग्र को विश्लेषण की प्राथमिक इकाई मानता है, वह उस ग्रामीण समाज के इतिहास के बजाय राजकीय लेखांकन का इतिहास उत्पन्न करने का जोखिम उठाता है जिस पर वह लेखांकन आधारित था।" गद्यांश के अनुसार, किसी प्रांत का एक समग्र राजस्व आँकड़ा क्या छिपाता है?
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उत्तर: B) बोझ का एक वितरण जो धारण-आकार, निर्धारक अधिकारी से निकटता, तथा भुगतान पर बातचीत अथवा उससे बचने की क्षमता के अनुसार भिन्न होता था
गद्यांश सीधे बताता है: 'एक ही संख्या के पीछे बोझ का एक ऐसा वितरण निहित है जो धारण-आकार, निर्धारक अधिकारी से निकटता, तथा कृषक की पूर्ण भुगतान पर बातचीत अथवा उससे बचने की क्षमता के अनुसार बेहद भिन्न होता था' — जो सटीक रूप से पहचानता है कि समग्र आँकड़ा क्या छिपाता है।
प्रश्न 91. अभिकथन (A): समकालीन ऐतिहासिक शोध में इतिहासकार नृविज्ञान व समाजशास्त्र सहित अंतर-विषयक पद्धतियों का बढ़ता हुआ प्रयोग करते हैं।
कारण (R): अंतर-विषयक दृष्टिकोण इतिहासकारों को अतीत के समाजों के उन पक्षों — जैसे नातेदारी संरचनाएँ, कर्मकांडीय प्रथा, अथवा प्रतीकात्मक अर्थ — का विश्लेषण करने में सहायता कर सकते हैं जिन्हें विशुद्ध राजनीतिक-आख्यानात्मक पद्धतियाँ पर्याप्त रूप से संबोधित नहीं कर सकतीं।
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उत्तर: A) A और R दोनों सत्य हैं, तथा R, A की सही व्याख्या है
दोनों कथन सही व परस्पर संबद्ध हैं: नृविज्ञान व समाजशास्त्र से अंतर-विषयक पद्धतियों के साथ इतिहासकारों का बढ़ता जुड़ाव सीधे इस विश्लेषणात्मक मूल्य से व्याख्यायित होता है जो ये अनुशासन अतीत के समाजों के उन पक्षों — नातेदारी, कर्मकांड, प्रतीकात्मक व्यवस्थाओं — की जाँच हेतु प्रदान करते हैं जिन्हें केवल पारंपरिक राजनीतिक-आख्यानात्मक ऐतिहासिक पद्धतियाँ पर्याप्त रूप से नहीं समेट सकतीं, जो R को A की एक वैध व्याख्या बनाता है।
प्रश्न 92. अभिकथन (A): लैंगिक इतिहासकार ऐतिहासिक समाजों के भीतर स्त्रीत्व के साथ-साथ पुरुषत्व की संरचना की भी बढ़ती हुई जाँच करते हैं।
कारण (R): एक क्षेत्र के रूप में लैंगिक इतिहास महिला इतिहास पर विशेष केंद्रण से आगे विस्तारित होकर लिंग को सभी लिंगों पर लागू एक संबंधात्मक, सामाजिक रूप से रचित श्रेणी के रूप में जाँचने लगा है।
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उत्तर: B) A और R दोनों सत्य हैं, तथा R, A की सही व्याख्या है
दोनों कथन सही व परस्पर संबद्ध हैं: पुरुषत्व की संरचनाओं पर इतिहासकारों का बढ़ता ध्यान सीधे महिला इतिहास पर विशेष केंद्रण से आगे लिंग को सभी लिंगों को समाहित करने वाली एक संबंधात्मक, सामाजिक रूप से रचित श्रेणी के रूप में जाँचने की ओर लैंगिक इतिहास के व्यापक अनुशासनात्मक विकास से व्याख्यायित होता है, जो R को A की एक वैध व्याख्या बनाता है।
प्रश्न 93. ऐतिहासिक स्रोत मूल्यांकन में 'आंतरिक आलोचना' व 'बाह्य आलोचना' के बीच भेद किसे संदर्भित करता है?
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उत्तर: A) बाह्य आलोचना किसी स्रोत की प्रामाणिकता (वास्तविकता, तिथि, लेखकत्व) का आकलन करती है, जबकि आंतरिक आलोचना उसकी विषयवस्तु की विश्वसनीयता व अर्थ का आकलन करती है
मानक ऐतिहासिक पद्धति में, 'बाह्य आलोचना' किसी स्रोत की प्रामाणिकता स्थापित करने को संदर्भित करती है — उसकी वास्तविकता, तिथि व लेखकत्व की सत्यापन — जबकि 'आंतरिक आलोचना' में स्रोत की वास्तविक विषयवस्तु की विश्वसनीयता, अर्थ व व्याख्या का आकलन सम्मिलित है, यह स्रोत-आधारित ऐतिहासिक शोध में एक आधारभूत भेद है।
प्रश्न 94. गद्यांश 2 (प्रश्न 96-100): निम्नलिखित गद्यांश पढ़कर आगे दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
"प्रारंभिक मध्यकालीन भारत का इतिहासकार का विवरण इस धारणा पर आधारित नहीं हो सकता कि दीर्घ-दूरी मुद्रा के संदर्भों में कमी स्वतः ही विनिमय में सामान्य रूप से कमी को दर्शाती है। थोक कृषि उत्पाद, नमक तथा शिल्प वस्तुओं का क्षेत्रीय नेटवर्कों के भीतर संचारित व्यापार अभिलेखीय अभिलेखों में बहुत कम निशान छोड़ सकता है, ठीक इसलिए क्योंकि इसे उस अनुष्ठानिक अथवा स्मारकीय अवसर की आवश्यकता नहीं थी जिसे अभिलेख सामान्यतः चिह्नित करते थे। जो इतिहासकार अंकित विनिमय पर अभिलेखीय स्रोतों की सापेक्ष चुप्पी को एक सामान्यीकृत कृषि-बंदी के प्रमाण के रूप में पढ़ता है, वह एक विशेष प्रकार के साक्ष्य की सीमाओं को उस अर्थव्यवस्था की सीमाओं के रूप में गलत समझने का जोखिम उठाता है जिसका वह वर्णन करने हेतु अभिप्रेत है। बुद्धिमानी का मार्ग यह है कि भूमि-अनुदानों के प्रसार, स्थानीय विनिमय-केंद्रों के विस्तार, तथा दीर्घ-दूरी मुद्राशास्त्रीय साक्ष्य की चुप्पी को तीन पृथक प्रश्नों के रूप में देखा जाए, जिनमें से प्रत्येक को अपने स्वयं के प्रमाण-समूह की आवश्यकता है, न कि उन्हें एक समान पतन के एकल आख्यान में समेट दिया जाए।" गद्यांश के अनुसार, लेखक किस पद्धतिगत त्रुटि के प्रति सावधान करता है?
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उत्तर: C) मुद्रा संबंधी अभिलेखीय संदर्भों में कमी को विनिमय/व्यापार में सामान्य पतन के स्वतः प्रमाण के रूप में मानना
गद्यांश का प्रारंभिक वाक्य सीधे इस सावधानी को बताता है: इतिहासकार का विवरण 'इस धारणा पर आधारित नहीं हो सकता कि दीर्घ-दूरी मुद्रा के संदर्भों में कमी स्वतः ही विनिमय में सामान्य रूप से कमी को दर्शाती है' — यही वह पद्धतिगत त्रुटि है जिसे रेखांकित किया जा रहा है।
प्रश्न 95. निम्नलिखित में से कौन-सा इतिहास-लेखन शब्द व उसकी सही परिभाषा का युग्म गलत है?
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उत्तर: B) एनाक्रोनिज़्म (कालविपर्यय) — एक शब्द जो एक ऐतिहासिक घटना का वर्णन करता है जो ठीक सही, सत्यापित कालानुक्रमिक समय पर बिना किसी कालनिर्धारण त्रुटि के घटित हुई
'एनाक्रोनिज़्म' (कालविपर्यय) वास्तव में किसी ऐसी वस्तु को संदर्भित करता है जो गलत कालानुक्रमिक अवधि में रखी गई हो — एक वस्तु, विचार, अथवा संदर्भ जो अपने वास्तविक ऐतिहासिक समय से पहले प्रकट होता है (अथवा एक परवर्ती तत्व जिसे गलती से एक प्रारंभिक काल का माना जाता है) — जो 'ठीक सही समय पर घटित होने' के विपरीत है — यह युग्म गलत है। शेष तीन शब्द (हैगियोग्राफी, पैलिम्पसेस्ट, प्रोवेनेंस) सही रूप से परिभाषित हैं।
प्रश्न 96. ऐतिहासिक पुनर्निर्माण में मुद्राशास्त्रीय (सिक्का) साक्ष्य के प्रयोग के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
I. सिक्का निक्षेप, प्राप्ति-स्थल तथा धात्विक संरचना व्यापार-नेटवर्कों, राजनीतिक नियंत्रण तथा आर्थिक परिस्थितियों हेतु मूल्यवान साक्ष्य प्रदान कर सकते हैं।
II. बिना किसी अन्य पुष्टिकारक स्रोत के, केवल मुद्राशास्त्रीय साक्ष्य को ही किसी भी काल के संपूर्ण राजनीतिक इतिहास के पुनर्निर्माण हेतु पर्याप्त माना जाता है।
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उत्तर: A) केवल I सही है
कथन I सही है: सिक्का निक्षेप, उनके प्राप्ति-स्थान तथा धात्विक संरचना किसी दिए गए काल के व्यापार-नेटवर्कों, राजनीतिक नियंत्रण की सीमा तथा आर्थिक परिस्थितियों के पुनर्निर्माण हेतु मूल्यवान साक्ष्य प्रदान करते हैं। कथन II गलत व अतिरंजित है: मुद्राशास्त्रीय साक्ष्य, यद्यपि मूल्यवान है, को इतिहासकारों द्वारा सामान्यतः अन्य स्रोत-प्रकारों (अभिलेखीय, साहित्यिक, पुरातात्विक) के साथ संयोजन में सर्वाधिक उपयोगी समझा जाता है, न कि संपूर्ण राजनीतिक इतिहास के पुनर्निर्माण हेतु अकेले पर्याप्त।
प्रश्न 97. 'कालविभाजन' (इतिहास को 'प्राचीन', 'मध्यकालीन', 'आधुनिक' जैसे युगों में विभाजित करना) की इतिहास-लेखन अवधारणा के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
I. कालविभाजन योजनाएँ इतिहास-लेखन रचनाएँ हैं जो इस पर निर्भर करते हुए भिन्न हो सकती हैं कि एक इतिहासकार किन मानदंडों (राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक) पर बल देना चुनता है।
II. सभी इतिहासकार विश्व के प्रत्येक क्षेत्र पर लागू एक ही, निश्चित, अपरिवर्तनीय काल-सीमाओं के समुच्चय पर सार्वभौमिक रूप से सहमत हैं।
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उत्तर: C) केवल I सही है
कथन I सही है: कालविभाजन को इतिहासकारों द्वारा व्यापक रूप से एक रचित विश्लेषणात्मक उपकरण के रूप में मान्यता प्राप्त है, जिसकी सीमाएँ इस पर निर्भर करते हुए भिन्न होती हैं कि राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक अथवा सांस्कृतिक मानदंडों पर बल दिया गया है। कथन II गलत है: सभी क्षेत्रों व इतिहास-लेखन परंपराओं में समान रूप से लागू कोई सार्वभौमिक, निश्चित कालविभाजन योजना नहीं है — वास्तव में, 'मध्यकालीन' भारत की सीमाएँ स्वयं निरंतर विद्वत्तापूर्ण चर्चा का विषय बनी हुई हैं।
प्रश्न 98. इतिहास-लेखन शब्द 'प्रेज़ेंटिज़्म', जो ऐतिहासिक पद्धति पाठ्यक्रमों में प्रायः उठाई जाने वाली एक सावधानी है, को सर्वोत्तम रूप से किस रूप में परिभाषित किया जाता है?
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उत्तर: A) अतीत की घटनाओं व कर्ताओं की व्याख्या पर वर्तमान-कालीन मूल्यों, श्रेणियों अथवा धारणाओं का अनालोचनात्मक प्रयोग
'प्रेज़ेंटिज़्म' उस पद्धतिगत त्रुटि को संदर्भित करता है जिसमें अतीत की घटनाओं व ऐतिहासिक कर्ताओं की व्याख्या पर वर्तमान-कालीन मूल्यों, श्रेणियों अथवा धारणाओं को अनालोचनात्मक रूप से लागू किया जाता है, न कि उन्हें उनके अपने विशिष्ट ऐतिहासिक व सांस्कृतिक संदर्भ में समझने का प्रयास किया जाता है — यह सुदृढ़ ऐतिहासिक पद्धति हेतु केंद्रीय एक सावधानी है।
प्रश्न 99. प्राचीन भारतीय सामाजिक संरचनाओं के इतिहास-लेखन में आर.एस. शर्मा के योगदान के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
I. अपने सामंतवाद सिद्धांत से परे, शर्मा ने प्राचीन भारतीय भौतिक संस्कृति, विशेषतः लौह प्रौद्योगिकी की भूमिका, के अध्ययन में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।
II. शर्मा के कार्य को मार्क्सवादी इतिहास-लेखन पद्धति से पूर्णतः असंबद्ध माना जाता है, जो इसके बजाय एक विशुद्ध राष्ट्रवादी ढाँचे को दर्शाता है।
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उत्तर: A) केवल I सही है
कथन I सही है: अपने सुविख्यात सामंतवाद सिद्धांत से परे, आर.एस. शर्मा ने प्राचीन भारतीय भौतिक संस्कृति के अध्ययन में महत्वपूर्ण योगदान दिया, विशेष रूप से प्रारंभिक ऐतिहासिक भारत में कृषि विस्तार व सामाजिक परिवर्तन को सक्षम बनाने में लौह प्रौद्योगिकी की भूमिका की जाँच करते हुए। कथन II गलत है तथा प्राचीन भारत के मार्क्सवादी इतिहास-लेखन के भीतर एक अग्रणी विभूति के रूप में शर्मा की सुस्थापित स्थिति का प्रत्यक्ष खंडन करता है, न कि एक विशुद्ध राष्ट्रवादी ढाँचे को।
प्रश्न 100. 'प्रोसोपोग्राफी' (सामूहिक जीवनी) की इतिहास-लेखन पद्धति में क्या सम्मिलित है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: A) व्यापक सामाजिक/राजनीतिक प्रतिरूपों की पहचान हेतु ऐतिहासिक व्यक्तियों के एक समूह की साझा विशेषताओं, करियरों तथा संबंधों का व्यवस्थित अध्ययन
प्रोसोपोग्राफी में व्यापक सामाजिक, राजनीतिक अथवा संस्थागत प्रतिरूपों की पहचान हेतु ऐतिहासिक व्यक्तियों के एक परिभाषित समूह की साझा विशेषताओं, करियर प्रक्षेपपथों तथा संबंधों का व्यवस्थित अध्ययन सम्मिलित है — न कि एक एकल जीवनी-विषय — यह एक ऐसी पद्धति है जिसका अनुप्रयोग प्राचीन रोमन सीनेटरीय अध्ययनों में इसके मूल प्रयोग से कहीं आगे है, जिसमें भारतीय ऐतिहासिक संदर्भ (जैसे कुलीनों अथवा अधिकारियों के समूहों का अध्ययन) भी सम्मिलित हैं।
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