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UGC NET इतिहास यूनिट 7 संपूर्ण अवलोकन नोट्स (हिंदी): आधुनिक भारतीय इतिहास के स्रोत
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यूनिट 7 / 10 · आधुनिक भारत। यह यूनिट आधुनिक भारत के स्रोत, अंग्रेज़ों के सत्ता पाने का तरीक़ा, 1857 का विद्रोह और औपनिवेशिक शासन का ढांचा लेती है। प्रश्न तिथियों व संधियों, अधिनियमों व उनके बदलावों और 1857 पर इतिहासकारों के मतों पर आते हैं।
- कैसे पढ़ें: युद्धों व संधियों को समय-रेखा की तरह, अधिनियमों को तालिका की तरह, और 1857 को कारण, घटनाक्रम, प्रकृति व प्रभाव की तरह सीखिए; व्याख्या से पहले अभ्यास प्रश्न कीजिए।
- आधिकारिक टॉपिक: सभी 8, सिलेबस के क्रम में।
यह पेज क्या है: हर आधिकारिक टॉपिक के संपूर्ण अवलोकन नोट्स: मुख्य तथ्य, इतिहासकारों की बहसें और परीक्षा में प्रश्न कैसे पूछे जाते हैं, इतने संक्षिप्त कि पूरी यूनिट एक बैठक में दोहराई जा सके। हर टॉपिक के पीछे की पूरी व्याख्या के लिए पूरे आधुनिक भारत नोट्स देखिए।
1. अभिलेखागारीय सामग्री, जीवनचरित, संस्मरण, समाचार पत्र, मौखिक साक्ष्य, सिक्के
मूल बात। आधुनिक भारत के पास किसी भी काल से अधिक प्रलेख हैं, पर हर स्रोत का अपना पक्षपात है।
- सरकारी अभिलेख। सरकारी कार्यवाहियां व परामर्श, जनगणना (1872 से), गज़ेटियर, संसदीय काग़ज़ व आयोगों की रिपोर्टें, जो राष्ट्रीय अभिलेखागार व क्षेत्रीय व लंदन के संग्रहों में हैं। वे दिखाते हैं कि राज्य क्या जानना चाहता था और लोगों को कैसे वर्गीकृत करता था। इतिहासकार मानते हैं कि जाति व धर्म की जनगणना-श्रेणियों ने उन्हीं पहचानों को गढ़ने में मदद की जिन्हें वे गिन रही थीं।
- निजी व सार्वजनिक स्वर। जीवनचरित व आत्मकथाएं (गांधी, नेहरू), संस्मरण, और अंग्रेज़ी व देशी भाषाओं के समाचार पत्र (द हिंदू, अमृत बाज़ार पत्रिका, केसरी), जो जनमत व राष्ट्रवादी तर्क दिखाते हैं।
- अन्य। मौखिक साक्ष्य (विभाजन व कम लिखित अभिलेख वाले समूहों के लिए), तस्वीरें और सिक्के।
- विदेशी विवरण। यूरोपीय यात्रियों के वृतांत सांस्कृतिक पक्षपात व ग़लतफ़हमी के कारण भारतीय स्रोतों से जांचे जाते हैं।
- तस्वीरें। वे मूल्यवान दृश्य साक्ष्य हैं, पर इतिहासकार को फ़ोटोग्राफ़र का दृष्टिकोण, उद्देश्य व चयन पूछना होता है।
परीक्षा की दृष्टि से: हर स्रोत का मूल्य व सीमा। फंदा: कोई स्रोत तटस्थ नहीं; सरकारी अभिलेख औपनिवेशिक प्राथमिकताएं दर्शाते हैं।
2. यूरोपीय व्यापारी 16वीं–18वीं सदी: पुर्तगाली, डच, फ्रांसीसी, ब्रिटिश
मूल बात। चार यूरोपीय शक्तियों ने भारतीय व्यापार के लिए होड़ की; अंग्रेज़ समुद्री शक्ति, वित्त व राजनीति से जीते।
- पुर्तगाली। वास्को-द-गामा 1498 में कालीकट पहुंचा; अल्मीडा की “नीला जल” नीति; अल्बुकर्क ने 1510 में गोवा लिया व अंतर्विवाह को बढ़ावा दिया। मुग़ल दबाव (हुगली, 1632), डच प्रतिद्वंद्विता व कमज़ोर वित्त से वे घटे; बंबई 1661 में अंग्रेज़ों को मिला।
- डच। 1602 में कंपनी बनी, मछलीपटनम, पुलिकट व चिनसुरा से व्यापार किया; ध्यान इंडोनेशिया के मसालों पर था, और अंग्रेज़ों ने 1759 में बेदारा में उन्हें हराया।
- अंग्रेज़। 1600 का चार्टर; सूरत (1613), मद्रास (1639), बंबई (1668), कलकत्ता (1690); 1717 का फ़रमान।
- फ़्रांसीसी। 1664 की कंपनी; पांडिचेरी (1674)। तीन कर्नाटक युद्ध (1746-63) वांडीवाश (1760) में फ़्रांसीसी हार व पेरिस की संधि (1763) पर समाप्त हुए।
परीक्षा की दृष्टि से: कंपनी ↔ वर्ष व बस्ती। फंदा: फ़्रांसीसी कमज़ोर नौसेना व वित्त के कारण हारे, डूप्ले की महत्त्वाकांक्षा की कमी से नहीं।
3. ब्रिटिश आधिपत्य की स्थापना व विस्तार
मूल बात। अंग्रेज़ों ने प्लासी के बाद लगभग एक सदी में युद्ध, सहायक संधि व विलय से विस्तार किया।
| तिथि | घटना | परिणाम |
|---|---|---|
| 1757 | प्लासी (सिराजुद्दौला, मीर जाफ़र, क्लाइव) | बंगाल पर कंपनी का नियंत्रण |
| 1764-65 | बक्सर; इलाहाबाद की संधि | बंगाल, बिहार व उड़ीसा की दीवानी |
| 1767-99 | चार आंग्ल-मैसूर युद्ध | 1799 में टीपू मारा गया |
| 1775-1818 | तीन आंग्ल-मराठा युद्ध | सालबाई की संधि (1782); पेशवा का अंत (1818) |
| 1843-49 | सिंध; दो आंग्ल-सिख युद्ध | 1849 में पंजाब का विलय |
- सहायक संधि (वेलेज़ली): शासक अंग्रेज़ी सेना रखता, उसका ख़र्च देता, रेज़िडेंट स्वीकारता और विदेश-नीति छोड़ता था; हैदराबाद (1798) पहला था।
- व्यपगत सिद्धांत (डलहौज़ी): प्राकृतिक उत्तराधिकारी के बिना राज्य अंग्रेज़ों में मिल जाता था (सतारा 1848, झांसी 1853, नागपुर 1854); अवध का 1856 में कुशासन के आरोप पर विलय हुआ।
परीक्षा की दृष्टि से: घटना ↔ तिथि व परिणाम (प्लासी 1757, बक्सर 1764, टीपू की मृत्यु 1799, पंजाब 1849); सहायक संधि व व्यपगत की परिभाषा। फंदा: हैदराबाद पहला सहायक-संधि सहयोगी था; व्यपगत सिद्धांत डलहौज़ी का है।
4. ब्रिटिश संबंध: बंगाल, अवध, हैदराबाद, मैसूर, कर्नाटक, पंजाब
मूल बात। हर राज्य से व्यवहार अलग था, पर ढर्रा वही: पहले नियंत्रण, फिर विलय।
| राज्य | संबंध |
|---|---|
| बंगाल | प्लासी व बक्सर; दीवानी (1765); 1772 तक द्वैध शासन |
| अवध | बक्सर का सहयोगी; 1801 में प्रदेश-हस्तांतरण वाली सहायक संधि; 1856 में विलय |
| हैदराबाद | पहली सहायक संधि (1798); रियासत के रूप में बचा |
| मैसूर | चार युद्ध; हैदर अली व टीपू सुल्तान; 1799 में टीपू मारा गया, हिंदू वाडियार बहाल |
| कर्नाटक | नवाब के ऋण व कर्नाटक युद्ध; 1801 में प्रशासन अपने हाथ में लिया |
| पंजाब | रणजीत सिंह की अमृतसर संधि (1809); दूसरे सिख युद्ध (1849) के बाद विलय |
परीक्षा की दृष्टि से: राज्य ↔ मुख्य घटना या संधि। फंदा: अवध का 1856 में कुशासन के आधार पर विलय हुआ, व्यपगत सिद्धांत से नहीं।
5. 1857 का विद्रोह: कारण, प्रकृति, प्रभाव
मूल बात। एक सैनिक विद्रोह राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक व धार्मिक शिकायतों से व्यापक विद्रोह बन गया।
- कारण। राजनीतिक: व्यपगत सिद्धांत व अवध का विलय। आर्थिक: भारी भू-राजस्व व कारीगरों की तबाही। सामाजिक-धार्मिक: धर्मांतरण का भय व रीतियों में हस्तक्षेप। सैनिक: नई एनफ़ील्ड राइफ़ल के चिकने कारतूस, कम वेतन और सामान्य सेवा भर्ती अधिनियम (1856)।
- घटनाक्रम। 10 मई 1857 को मेरठ से शुरू होकर दिल्ली (बहादुर शाह ज़फ़र नाममात्र के नेता), कानपुर (नाना साहब, तात्या टोपे), लखनऊ (बेगम हज़रत महल), झांसी (रानी लक्ष्मीबाई) व बिहार (कुंवर सिंह) पहुंचा। 1858 तक दबा दिया गया; दिल्ली सितंबर 1857 में गिरी।
- प्रकृति। विवादित: सिपाही विद्रोह (औपनिवेशिक मत); “प्रथम स्वतंत्रता संग्राम” (सावरकर); आर.सी. मजूमदार का निष्कर्ष कि यह न पहला था, न राष्ट्रीय, न स्वतंत्रता-संग्राम; एस.एन. सेन का अध्ययन; किसान व निम्नवर्गीय पाठ (एरिक स्टोक्स, रणजीत गुहा)।
- प्रभाव। 1858 के भारत शासन अधिनियम ने कंपनी का शासन समाप्त किया; महारानी की घोषणा ने विलय न करने व धार्मिक सहिष्णुता का वादा किया; सेना में यूरोपीय सैनिक बढ़ाकर उसका पुनर्गठन हुआ; मुग़ल वंश समाप्त हुआ।
परीक्षा की दृष्टि से: नेता ↔ केंद्र; इतिहासकार ↔ मत। फंदा: बहादुर शाह प्रतीकात्मक नेता थे; उन्होंने विद्रोह का संचालन नहीं किया।
6. कम्पनी व क्राउन प्रशासन (1773–1858)
मूल बात। अधिनियमों की एक शृंखला ने नियंत्रण कंपनी से संसद और अंत में ताज को सौंपा।
| अधिनियम | मुख्य बदलाव |
|---|---|
| रेग्युलेटिंग एक्ट 1773 | बंगाल का गवर्नर-जनरल; कलकत्ता में सुप्रीम कोर्ट |
| पिट्स इंडिया एक्ट 1784 | बोर्ड ऑफ़ कंट्रोल; कंपनी व ताज का दोहरा नियंत्रण |
| चार्टर एक्ट 1813 | कंपनी का व्यापार-एकाधिकार समाप्त (चाय व चीन को छोड़कर); शिक्षा के लिए अनुदान |
| चार्टर एक्ट 1833 | भारत का गवर्नर-जनरल; कंपनी का व्यापार समाप्त; विधि सदस्य |
| चार्टर एक्ट 1853 | सिविल सेवा में खुली प्रतियोगिता |
| 1858 का भारत शासन अधिनियम | ताज का शासन; भारत सचिव व भारत परिषद; वायसराय |
कॉर्नवालिस ने स्थायी बंदोबस्त (1793) व पेशेवर सिविल सेवा शुरू की; बेंटिंक ने सती समाप्त की (1829); डलहौज़ी ने रेल, तार व डाक-व्यवस्था शुरू की।
परीक्षा की दृष्टि से: अधिनियम ↔ बदलाव (1773, 1784, 1813, 1833, 1853, 1858)। फंदा: खुली प्रतियोगिता 1853 के चार्टर एक्ट से आई; कंपनी का शासन 1858 के अधिनियम से समाप्त हुआ।
7. सर्वोच्च सत्ता, सिविल सेवा, न्यायतंत्र, पुलिस, सेना; रजवाड़ा नीति
मूल बात। औपनिवेशिक राज्य कुछ संस्थाओं पर टिका था: सिविल सेवा, अदालतें, पुलिस, सेना और रियासतों के प्रति नीति।
- सिविल सेवा। कॉर्नवालिस ने बनाई; प्रतियोगी प्रवेश 1855 में शुरू हुआ और सत्येंद्रनाथ टैगोर 1863 में पहले भारतीय बने।
- न्यायतंत्र व पुलिस। विनियमों के अधीन अदालतें; मैकाले के विधि-संहिताकरण से भारतीय दंड संहिता (1860); 1861 का पुलिस अधिनियम।
- सेना। ब्रिटिश अधिकारियों के अधीन भारतीय सिपाहियों की बहुलता, जिसे 1857 के बाद ब्रिटिश अंश बढ़ाकर पुनर्गठित किया गया।
- सर्वोच्च सत्ता। रियासतें लगभग दो-पांचवें भू-भाग में थीं। नीति अहस्तक्षेप से विलय (डलहौज़ी) तक, फिर 1858 के बाद गारंटियों तक, और कर्ज़न के सर्वोच्च सत्ता के दावे तक पहुंची; फिर नरेंद्र मंडल (1921) व बटलर समिति (1927) आए।
- न्यासिता का इतिहास-लेखन। अंग्रेज़ों ने दावा किया कि वे भारत को उसके विकास के लिए न्यास के रूप में चलाते हैं; राष्ट्रवादी व बाद के उत्तर-औपनिवेशिक इतिहासकार कहते हैं कि यह भाषा प्रायः शोषण को ढकती थी।
परीक्षा की दृष्टि से: संस्था ↔ संस्थापक या अधिनियम। फंदा: “न्यासिता” जांचने योग्य विचारधारा है, तटस्थ वर्णन नहीं।
8. स्थानीय स्व-सरकार; संवैधानिक परिवर्तन 1909–1935
मूल बात। राष्ट्रवादी दबाव पर सीमित स्व-शासन, फिर सीमित प्रतिनिधित्व, क़दम-दर-क़दम दिए गए।
- स्थानीय स्व-सरकार। मेयो का प्रस्ताव (1870) वित्तीय विकेंद्रीकरण पर; रिपन का प्रस्ताव (1882), जिसे प्रायः स्थानीय स्व-शासन का अधिकार-पत्र कहा जाता है।
- 1909 (मॉर्ले-मिंटो; भारतीय परिषद अधिनियम 1909)। मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल; प्रांतों में निर्वाचित ग़ैर-सरकारी बहुमत; वायसराय परिषद में एक भारतीय (एस.पी. सिन्हा)।
- 1919 (मॉन्टेग्यू-चेम्सफ़र्ड; भारत शासन अधिनियम 1919)। प्रांतों में द्वैध शासन; द्विसदनीय केंद्र; व्यापक सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व।
- 1927-32। पूरी तरह श्वेत साइमन आयोग व उसका बहिष्कार; नेहरू रिपोर्ट; सांप्रदायिक पंचाट व पूना समझौता।
- 1935 (भारत शासन अधिनियम 1935)। प्रांतीय स्वायत्तता व द्वैध शासन का अंत; एक संघ जो कभी शुरू नहीं हुआ; संघीय न्यायालय व रिज़र्व बैंक; सिंध व उड़ीसा नए प्रांत।
परीक्षा की दृष्टि से: अधिनियम ↔ विशेषता (द्वैध शासन: 1919; पृथक निर्वाचक मंडल: 1909)। फंदा: 1935 की संघीय योजना कभी लागू नहीं हुई।
दोहराने की सूची
- मैं हर स्रोत का पक्षपात व उपयोग बता सकता/सकती हूँ।
- मैं यूरोपीय कंपनियां उनके मुख्य वर्षों के साथ और फ़्रांसीसियों की हार का कारण बता सकता/सकती हूँ।
- मैं प्लासी से 1849 तक के युद्ध व संधियां बता सकता/सकती हूँ और सहायक संधि व व्यपगत को परिभाषित कर सकता/सकती हूँ।
- मैं 1857 के कारण, प्रकृति पर बहस व प्रभाव समझा सकता/सकती हूँ।
- मैं 1773 से 1935 तक हर अधिनियम को उसके मुख्य बदलाव से मिला सकता/सकती हूँ।
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इस गाइड ने एक तुलना गहराई से कवर की। हमारे आधुनिक भारत नोट्स, एक असली हिस्ट्री जेआरएफ द्वारा लिखे गए, पूरा सेक्शन इसी तरह कवर करते हैं — जुड़ा हुआ, परीक्षा-केंद्रित, पीवाईक्यू-टैग्ड — ताकि परीक्षा की रात आपको अकेले कड़ियाँ न जोड़नी पड़ें।
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