प्राचीन भारत · डीप-डाइव गाइड
UGC NET इतिहास यूनिट 3 संपूर्ण अवलोकन नोट्स (हिंदी): क्षेत्रीय राज्यों का उद्भव
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यूनिट 3 / 10 · प्राचीन भारत। यह यूनिट लगभग 600-1200 ई. के क्षेत्रीय राज्यों और उन्हें समझाने वाली इतिहास-बहसों को लेती है। प्रश्न वंश, क्षेत्र व उपलब्धि, संस्थाओं (भू-अनुदान, मंदिर, श्रेणियां, सभाएं) और राज्य-निर्माण के मॉडलों पर आते हैं।
- कैसे पढ़ें: वंशों को क्षेत्र के अनुसार सीखिए, फिर साझा लक्षण, फिर बहसें; व्याख्या से पहले अभ्यास प्रश्न कीजिए।
- आधिकारिक टॉपिक: सभी 14, सिलेबस के क्रम में।
यह पेज क्या है: हर आधिकारिक टॉपिक के संपूर्ण अवलोकन नोट्स: मुख्य तथ्य, इतिहासकारों की बहसें और परीक्षा में प्रश्न कैसे पूछे जाते हैं, इतने संक्षिप्त कि पूरी यूनिट एक बैठक में दोहराई जा सके। हर टॉपिक के पीछे की पूरी व्याख्या के लिए पूरे प्राचीन भारत नोट्स देखिए।
1. दक्कन: गंग, कदंब, चालुक्य (प., पू.), राष्ट्रकूट, कल्याणी चालुक्य, काकतीय, होयसल, यादव
मूल बात। दक्कन पर एक के बाद एक प्रतिद्वंद्वी शक्तियां शासन करती रहीं, और सबने मंदिर व अभिलेख छोड़े।
- पश्चिमी गंग (तलकाड): जैन धर्म के संरक्षक; श्रवणबेलगोला की गोमटेश्वर प्रतिमा चामुंडराय के समय (लगभग 981) बनी। कदंब (बनवासी): संस्थापक मयूरशर्मन।
- बादामी के चालुक्य: पुलकेशिन द्वितीय (610-642), जिसकी विजयों की प्रशंसा रविकीर्ति के ऐहोल अभिलेख में है, ने हर्ष को नर्मदा पर रोका; पल्लव नरसिंहवर्मन प्रथम ने 642 में वातापी ले ली। पूर्वी चालुक्य (वेंगी) पुलकेशिन द्वितीय के भाई कुब्ज विष्णुवर्धन के वंशज हैं।
- राष्ट्रकूट (मान्यखेट): दंतिदुर्ग, कृष्ण प्रथम (एलोरा का कैलास मंदिर), अमोघवर्ष प्रथम (कन्नड़ कृति कविराजमार्ग), और कन्नौज के लिए त्रिपक्षीय संघर्ष में भागीदारी।
- कल्याणी चालुक्य: विक्रमादित्य षष्ठ (बिल्हण की विक्रमांकदेवचरित में प्रशंसित; विज्ञानेश्वर की मिताक्षरा उसी के दरबार में लिखी)। काकतीय (वारंगल; रुद्रमादेवी; रामप्पा मंदिर), होयसल (बेलूर, हलेबीड) और यादव (देवगिरि), जो खलजियों व तुग़लकों के आगे गिरे।
स्रोत व बहस। रविकीर्ति का ऐहोल अभिलेख (634) पुलकेशिन द्वितीय को सराहता है; समनगढ़ व संजान ताम्रपत्र राष्ट्रकूटों को दर्ज करते हैं। पल्लव-चालुक्य प्रतिद्वंद्विता ने दक्षिण को आकार दिया। “त्रिपक्षीय संघर्ष” नाम स्वयं बहस में है, क्योंकि राष्ट्रकूट दक्षिण की ओर भी देखते थे।
परीक्षा की दृष्टि से: वंश ↔ राजधानी, शासक या स्मारक। फंदा: पूर्वी चालुक्य बादामी शाखा के थे, कल्याणी शाखा के नहीं।
2. दक्षिण भारत: पल्लव, चेर, चोल, पांड्य
मूल बात। तमिल व केरल प्रदेश ने इस काल के सबसे टिकाऊ राज्य दिए, और चोलों ने समुद्र-पार साम्राज्य बनाया।
- पल्लव (कांची): महेंद्रवर्मन प्रथम (नाटक मत्तविलास) और नरसिंहवर्मन प्रथम (महाबलीपुरम के रथ); तट-मंदिर और कैलासनाथ मंदिर।
- चोल: विजयालय, फिर राजराज प्रथम (तंजावुर का बृहदीश्वर मंदिर) और राजेंद्र प्रथम (गंगैकोंडचोलपुरम; लगभग 1025 में श्रीविजय पर नौसैनिक अभियान)। परांतक प्रथम के उत्तरमेरूर अभिलेख (919, 921) ग्राम-सभा के नियम बताते हैं; राजराज ने भूमि-सर्वेक्षण कराया और कुलोत्तुंग प्रथम ने चुंगियां हटाईं।
- पांड्य (मदुरै; कडुंगोन के बाद पुनरुत्थान) और चेर (केरल का महोदयपुरम) अरब व चीनी व्यापारियों से व्यापार करते थे।
परीक्षा की दृष्टि से: शासक ↔ स्मारक। फंदा: तट-मंदिर पल्लव है, बृहदीश्वर मंदिर चोल।
3. पूर्वी भारत: बंगाल के पाल, सेन; कामरूप के वर्मन; उड़ीसा के भौमाकार, सोमवंशी
मूल बात। पूर्व में पालों के अधीन बौद्ध संरक्षण रहा और सेनों के अधीन ब्राह्मणीय पुनरुत्थान।
- पाल: गोपाल (स्थानीय सरदारों द्वारा चुना गया, लगभग 750), धर्मपाल (विक्रमशिला), देवपाल (मुंगेर ताम्रपत्र में विजयें दर्ज), रामपाल। नालंदा व विक्रमशिला के संरक्षक; तिब्बत व दक्षिण-पूर्व एशिया से व्यापार; अतीश 1042 में विक्रमशिला से तिब्बत गए।
- सेन: विजयसेन, बल्लालसेन (दानसागर, अद्भुतसागर), लक्ष्मणसेन (जयदेव का गीतगोविंद उसके दरबार में); ब्राह्मणीय पुनरुत्थान।
- कामरूप: वर्मन (भास्करवर्मन हर्ष का मित्र; निधनपुर ताम्रपत्र)। उड़ीसा: भौमाकर (तिभुवनमहादेवी जैसी स्त्री शासक) और सोमवंशी, मंदिर-निर्माता (लिंगराज से संबद्ध)।
परीक्षा की दृष्टि से: शासक ↔ विहार या अभिलेख। फंदा: पाल बौद्ध संरक्षक थे, सेन ब्राह्मणीय।
4. पश्चिम भारत: वल्लभी के मैत्रक; गुजरात के चालुक्य
मूल बात। गुजरात ने व्यापार, विद्या और जैन संरक्षण को जोड़ा।
- मैत्रक (वल्लभी, लगभग 475 से): अनेक भू-अनुदान (ध्रुवसेन द्वितीय सबसे प्रसिद्ध); वल्लभी विद्या का केंद्र था, ह्वेनसांग ने भी उल्लेख किया। भड़ौच व खंभात जैसे बंदरगाहों ने संपदा बढ़ाई।
- चालुक्य (सोलंकी) (अन्हिलवाड़): भीम प्रथम (उसी के समय महमूद ने सोमनाथ लूटा), सिद्धराज जयसिंह, और कुमारपाल, जैन संरक्षक जिन्हें हेमचंद्र ने मार्ग दिखाया। माउंट आबू के दिलवाड़ा मंदिर (विमल, 1031; वस्तुपाल-तेजपाल का लूण वसही, लगभग 1230) उनके काल के हैं।
परीक्षा की दृष्टि से: वल्लभी व अन्हिलवाड़ को उनके शासकों, विद्या-केंद्र व संरक्षकों से मिलाना (कुमारपाल-हेमचंद्र)। फंदा: दोनों वंश अलग थे और अलग राजधानियों से शासन करते थे।
5. उत्तर भारत: गुर्जर-प्रतिहार, कलचुरी-चेदि, गहड़वाल, परमार
मूल बात। उत्तर में कन्नौज के लिए संघर्ष हावी रहा, फिर अनेक राजपूत-शैली के राज्य उभरे।
- प्रतिहार: नागभट प्रथम (अरबों को पश्चिम में रोकने का श्रेय), मिहिर भोज (शिखर; कन्नौज राजधानी), जिन्होंने पालों व राष्ट्रकूटों से त्रिपक्षीय संघर्ष किया। भोज की ग्वालियर प्रशस्ति व राजशेखर की काव्यमीमांसा इस संस्कृति की पहचान हैं।
- कलचुरी-चेदि (त्रिपुरी; गांगेयदेव के स्वर्ण सिक्के); गहड़वाल (कन्नौज; जयचंद 1194 में चंदावर पर मुहम्मद ग़ोरी से हारा); परमार (धार; मुंज और विद्वान राजा भोज, जिसने वास्तु पर समरांगण सूत्रधार लिखा); चंदेलों ने खजुराहो बनवाए (धंग के मंदिर; कंदरिया महादेव, लगभग 1030), और विद्याधर ने महमूद का सामना किया।
परीक्षा की दृष्टि से: वंश ↔ राजधानी व शासक (मिहिर भोज: प्रतिहार; भोज: परमार; जयचंद: गहड़वाल)। फंदा: कन्नौज का त्रिपक्षीय संघर्ष प्रतिहारों, पालों व राष्ट्रकूटों के बीच था, परमारों के बीच नहीं।
6. प्रारंभिक मध्यकाल: प्रशासन, राजनीतिक ढांचा, राजतंत्र वैधीकरण
मूल बात। राज्य बहुस्तरीय थे: अनेक सामंतों पर एक राजा, और शासन का औचित्य धर्म व वंश से।
- प्रशासन। सामंत अपनी सेना रखते थे; दक्षिण में स्थानीय सभाएं (सभा, ऊर, नगरम) गांव-नगर चलाती थीं और नाडु नामक क्षेत्रीय इकाइयों में समूहित थीं। चोलों के उत्तरमेरूर अभिलेख समिति-सदस्यों को पर्ची निकालकर चुनने की कुडवोलै पद्धति बताते हैं।
- वैधीकरण। वंशावलियां व अग्निकुल जैसे राजपूत-उत्पत्ति मिथक; हिरण्यगर्भ और तुलापुरुष जैसे दान; भव्य उपाधियां; राजा को देव-रूप मानना; मंदिरों व ब्राह्मणों को संरक्षण।
- राजपूत उत्पत्ति। अग्निकुल मिथक वैधीकरण की कथा है, वंश का प्रमाण नहीं। बी.डी. चट्टोपाध्याय दिखाते हैं कि कुल भूमि, सत्ता व अनुष्ठान-प्रतिष्ठा पाकर “राजपूत” बने (राजपूतीकरण)।
परीक्षा की दृष्टि से: सभाएं व उनके कार्य; राजा वैधता कैसे जताते थे। फंदा: पर्ची-पद्धति गांव की समितियों के लिए थी, राजा चुनने के लिए नहीं।
7. कृषि अर्थव्यवस्था: भू-अनुदान, श्रेणीबद्ध भू-अधिकार, किसान, जल संसाधन, कराधान, मुद्रा
मूल बात। भू-अनुदानों से खेती फैली, पर भूमि पर अधिकारों की परतें बनीं और सिक्कों का चलन कम हुआ।
- भू-अनुदान (ब्राह्मणों को ब्रह्मदेय, अग्रहार; मंदिरों को देवदान) में छूट व कभी प्रशासनिक अधिकार थे; काश्तकार व मज़दूर श्रेणीबद्ध अधिकारों से जोतते थे।
- जल। तालाब, नहर, कुएं; सिंचाई दक्षिण की सभाओं व मंदिरों का प्रमुख कार्य थी। चोल सिंचाई में एरि (तालाब) केंद्रीय थे; काकतीयों ने बड़ी झीलें खुदवाईं (रामप्पा)।
- कराधान। उपज का हिस्सा व अनेक कर: भाग, भोग, कर, हिरण्य, उदरंग; बेगार (वेट्टि)। भूमि कानि, वेलि जैसी इकाइयों में नापी जाती थी।
- मुद्रा। कई क्षेत्रों में कम सिक्के, जिसे आर.एस. शर्मा “बंद” सामंती अर्थव्यवस्था से जोड़ते हैं; आलोचक क्षेत्रीय सिक्कों व सक्रिय व्यापार की ओर इशारा करते हैं।
परीक्षा की दृष्टि से: ब्रह्मदेय, देवदान, अग्रहार की परिभाषा; भू-अनुदान को “बंद अर्थव्यवस्था” से जोड़ना। फंदा: अनुदान राजस्व व कुछ अधिकार देता था, हमेशा भूमि का पूर्ण स्वामित्व नहीं।
8. व्यापार व शहरीकरण: मार्ग, पत्तन, माल, श्रेणी (गिल्ड); दक्षिण-पूर्व एशिया से व्यापार
मूल बात। शक्तिशाली व्यापारी श्रेणियों व तटीय व्यापार ने दक्षिण व पश्चिम को तब भी व्यावसायिक रखा जब उत्तर में नगरों का ह्रास दिखता है।
- श्रेणियां: अय्यावोले (ऐहोल) पांच सौ, मणिग्रामम्, अंजुवन्नम्, नानादेसी, तिसैयायिरत्तु ऐन्नूरुव्वर (“हज़ार दिशाओं के पांच सौ”); नगरों में व्यापारियों की नगरम सभा।
- बंदरगाह व माल: महाबलीपुरम, नागपट्टिनम, क्विलोन, भड़ौच, खंभात; अरब से घोड़े आयात, मसाले, कपड़े और मोती निर्यात।
- दक्षिण-पूर्व एशिया: श्रीविजय पर चोल नौसैनिक अभियान; नागपट्टिनम में शैलेंद्र राजा का विहार; चोल दूत-मंडल चीन गए (1015, 1033)।
बहस। आर.एस. शर्मा उत्तर में नगरीय ह्रास देखते हैं; आर. चंपकलक्ष्मी व अन्य प्रायद्वीप में सक्रिय व्यापार व नगर दिखाते हैं।
परीक्षा की दृष्टि से: श्रेणी के नाम व क्षेत्र; नगरीय ह्रास की बहस। फंदा: नगरम व्यापारियों की संस्था थी, गांव की ऊर और सभा से अलग।
9. ब्राह्मणीय धर्म: वैष्णव, शैव; मंदिर, संरक्षण, क्षेत्रीय शैलियां
मूल बात। मंदिर धर्म, अर्थव्यवस्था व संरक्षण का केंद्र बने, क्षेत्रीय शैलियों में।
| शैली | क्षेत्र | उदाहरण |
|---|---|---|
| नागर | उत्तर व उड़ीसा | खजुराहो (चंदेल), लिंगराज, कोणार्क का सूर्य मंदिर |
| द्रविड़ | तमिल प्रदेश | पल्लवों का कैलासनाथ, चोलों का बृहदीश्वर |
| वेसर व दक्कन | कर्नाटक व दक्कन | ऐहोल, पट्टदकल (चालुक्य), एलोरा का कैलास (राष्ट्रकूट), होयसल मंदिर |
मंदिर भूमि के स्वामी थे, बहुतों को रोज़गार देते थे और बैंक की तरह काम करते थे, इसलिए वे आर्थिक के साथ धार्मिक संस्थाएं भी थे। चोलों ने बृहदीश्वर (1010), गंगैकोंडचोलपुरम व दारासुरम बनवाए, जिनमें विमान शिखर, मंडप और बाद में गोपुरम द्वार हैं।
परीक्षा की दृष्टि से: शैली ↔ क्षेत्र व उदाहरण (नागर: खजुराहो; द्रविड़: बृहदीश्वर)। फंदा: एलोरा का कैलास राष्ट्रकूट है, पल्लव नहीं।
10. दान, तीर्थ, भक्ति; तमिल भक्ति — शंकर, माधव, रामानुजाचार्य
मूल बात। भक्ति, दान और तीर्थ ने लोक-धर्म को आकार दिया, और दार्शनिकों ने उसे बौद्धिक रूप दिया।
- तमिल भक्ति: परंपरा से 63 शैव नयनार (अप्पर, संबंदर, सुंदरर के तेवारम्; मणिक्कवासगर) और 12 वैष्णव आळवार (नम्मालवार, आंडाल)। तेवारम् का संकलन नंबी आंडार नंबी ने किया, आळवारों के प्रबंधम् का नाथमुनि ने।
- दार्शनिक: शंकर (अद्वैत, 8वीं-9वीं सदी; श्रृंगेरी, द्वारका, पुरी, ज्योतिर्मठ के मठ), रामानुज (विशिष्टाद्वैत, 11वीं-12वीं सदी, श्रीरंगम; श्रीभाष्य) और माधव (द्वैत, 13वीं सदी)। कर्नाटक में बसव का वीरशैव आंदोलन 12वीं सदी का है।
बहस। भक्ति को निम्न वर्गों का सामाजिक विरोध, मंदिर-धर्म में समन्वय का साधन, या दोनों माना गया है; दक्षिण से उत्तर की ओर फैलाव पर भी मतभेद है।
परीक्षा की दृष्टि से: संत ↔ परंपरा (अप्पर: नयनार; नम्मालवार: आळवार) और दार्शनिक ↔ मत (शंकर: अद्वैत; रामानुज: विशिष्टाद्वैत; माधव: द्वैत)। फंदा: तमिल भक्त-संत दार्शनिकों से पहले के हैं।
11. समाज: वर्ण-जाति विस्तार; स्त्री स्थिति, विवाह, संपत्ति; जनजाति व अस्पृश्यता
मूल बात। सामाजिक ढांचा जटिल हुआ: अनेक नई जातियां व अधिक कठोर श्रेणीबद्धता।
- जाति। भू-अनुदानों, शिल्प-विशेषज्ञता और जनजातियों के समावेश से नई जातियां बनीं (कायस्थ, राजपूत); मिश्र-जाति सिद्धांत से उन्हें समझाया गया।
- स्त्रियां। कुछ क्षेत्रों में बाल-विवाह व सती अधिक हुए; स्त्रियां स्त्रीधन (अपनी संपत्ति) रख सकती थीं, और कुछ ने शासन किया।
- हाशिये। जनजातियां निम्न जातियों के रूप में समाहित हुईं; अस्पृश्यता कठोर हुई, और अलबेरूनी अंत्यजों का उल्लेख करता है।
- विधि। मेधातिथि की मनु-टीका, विज्ञानेश्वर की मिताक्षरा (पुत्र का जन्म से संपत्ति-अधिकार) और बंगाल में जीमूतवाहन का दायभाग।
परीक्षा की दृष्टि से: जातियों के बढ़ने के कारण; स्त्रियों के संपत्ति-अधिकार। फंदा: सती जैसी प्रथाएं क्षेत्र व काल के अनुसार भिन्न थीं; सामान्यीकरण ग़लत है।
12. शिक्षा: अग्रहार, मठ, महाविहार; क्षेत्रीय भाषाओं का विकास
मूल बात। शिक्षा ब्राह्मणीय, मठीय और मंदिर-संस्थाओं में संगठित थी, और क्षेत्रीय भाषाओं को साहित्यिक रूप मिला।
- केंद्र: अग्रहार व मठ; बौद्ध महाविहार नालंदा, विक्रमशिला, ओदंतपुरी, सोमपुरा। धर्मपाल ने विक्रमशिला व नालंदा को संरक्षण दिया; नालंदा का ह्रास लगभग 1200 के आसपास हुआ। कांची की घटिका, सालोटगी और कश्मीर में भी विद्या फली।
- भाषाएं: कन्नड़ (कविराजमार्ग, पंप), तेलुगु (नन्नय का महाभारत), तमिल (कंबन की रामावतारम्, पेरियपुराणम्), आरंभिक मराठी व बंगला (चर्यापद); अपभ्रंश कवि स्वयंभू व पुष्पदंत राष्ट्रकूट दरबारों में लिखते थे।
परीक्षा की दृष्टि से: भाषा ↔ आरंभिक कृति (कविराजमार्ग: कन्नड़; चर्यापद: बंगला) और महाविहारों के नाम। फंदा: नालंदा व विक्रमशिला बिहार की बौद्ध संस्थाएं थीं।
13. राज्य-निर्माण बहस: सामंत / खंडीय / समन्वयी मॉडल
मूल बात। इतिहासकार इस पर असहमत हैं कि ये राज्य किस प्रकार के थे।
| मॉडल | मुख्य विद्वान | तर्क |
|---|---|---|
| भारतीय सामंतवाद | आर.एस. शर्मा, डी.एन. झा | भू-अनुदान, कमज़ोर व्यापार व स्थानीय सामंतों ने सामंती व्यवस्था बनाई |
| खंडीय राज्य | बर्टन स्टाइन (दक्षिण भारत) | केंद्र में अनुष्ठानिक सत्ता, वास्तविक शक्ति स्थानीय सरदारों के पास |
| समन्वयी मॉडल | बी.डी. चट्टोपाध्याय, हरमन कुल्के | मंदिर व ब्राह्मणीय संस्कृति से स्थानीय समाजों का धीरे-धीरे समन्वय |
के.ए. नीलकंठ शास्त्री चोलों को नौकरशाही-युक्त, केंद्रीकृत राज्य मानते थे, जिसका उत्तर स्टाइन ने खंडीय मॉडल से दिया। हरबंस मुखिया जैसे आलोचक कहते हैं कि यूरोप का सामंतवाद भारत पर नहीं बैठता।
परीक्षा की दृष्टि से: विद्वान ↔ मॉडल। फंदा: स्टाइन का मॉडल चोल राज्य के लिए बना था, पूरे उपमहाद्वीप के लिए नहीं।
14. अरब संपर्क: सुलेमान, गजनवी विजय, अलबेरूनी
मूल बात। अरबों और फिर गज़नवियों ने भारत को इस्लामी जगत से अधिक निकटता से जोड़ा।
- अरब। मुहम्मद बिन क़ासिम ने 711-12 में सिंध जीता और दाहिर को हराया (चचनामा यह कथा कहता है); अरब व्यापारी मालाबार तट पर बसे, और व्यापारी सुलेमान ने 9वीं सदी में भारत का वर्णन किया।
- गज़नवी। महमूद ने लगभग 1000 से 1027 के बीच बार-बार हमले किए: नगरकोट (1009), मथुरा व कन्नौज (1018), सोमनाथ (1025-26); उसने हिंदू शाही आनंदपाल को भी हराया। उसके उद्देश्य (लूट, प्रतिष्ठा, धर्म) पर बहस है।
- अलबेरूनी महमूद के साथ आया और 1020 के दशक में संस्कृत ग्रंथों का अध्ययन कर किताब-उल-हिंद लिखी, जो भारतीय विज्ञान, धर्म व समाज का अध्ययन है। भारतीय खगोल व अंक बगदाद के अनुवादों से अरब जगत पहुंचे।
परीक्षा की दृष्टि से: सिंध-विजय व उसका स्रोत; अलबेरूनी की कृति। फंदा: सिंध पर अरब विजय गज़नवियों से तीन सदी पहले हुई।
दोहराने की सूची
- मैं हर प्रमुख वंश को उसके क्षेत्र, राजधानी व एक स्मारक से मिला सकता/सकती हूँ।
- मैं सामंत, सभाएं और राजाओं के वैधीकरण के तरीके बता सकता/सकती हूँ।
- मैं भू-अनुदान, सिक्कों की बहस और श्रेणियां समझा सकता/सकती हूँ।
- मैं नागर, द्रविड़ व वेसर मंदिरों को पहचानकर उदाहरण दे सकता/सकती हूँ।
- मैं सामंती, खंडीय व समन्वयी मॉडल और उनके विद्वान बता सकता/सकती हूँ।
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पूरे पाठ्यक्रम में यही स्पष्टता चाहिए?
इस गाइड ने एक तुलना गहराई से कवर की। हमारे प्राचीन भारत नोट्स, एक असली हिस्ट्री जेआरएफ द्वारा लिखे गए, पूरा सेक्शन इसी तरह कवर करते हैं — जुड़ा हुआ, परीक्षा-केंद्रित, पीवाईक्यू-टैग्ड — ताकि परीक्षा की रात आपको अकेले कड़ियाँ न जोड़नी पड़ें।
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